एक भारतीय शोधार्थी की नज़रों से चीन की पहली झलक और विश्लेषण-डॉ. आशीष शुक्ल

लगभग दो शताब्दियों पूर्व फ़्रांसीसी राजनीतिज्ञ नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि “भीमकाय चीन अभी सो रहा है, उसे सोने दो क्योंकि जब वह उठेगा तो संसार हिलने लगेगा|” वर्तमान वर्ष 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने फ़्रांस के साथ चीन के कूटनीतिक समबन्धों की 50वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में फ़्रांस में आयोजित एक समारोह में बोलते हुए कहा कि “आज शेर (चीन) जाग गया है. लेकिन यह शेर शांतिप्रिय, सुखद और सभ्य है|” बहुत से लोगों को इस शेर के शांतिप्रिय, सुखद और सभ्य होने पर संदेह हो सकता है, लेकिन सभी इस तथ्य पर जरुर एकमत होंगे कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चीन ने एक धमाकेदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है| वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में शायद ही ऐसा कोई ऐसी राष्ट्रीय राजधानी हो, शायद ही ऐसा कोई कोना हो जहाँ चीन के उत्थान पर बहस न हो रही हो|

अभी हाल ही में मुझे दक्षिण-पश्चिमी चीन में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला| इस अल्पकालीन चीन प्रवास के दौरान विषय विशेषज्ञों, विद्वानों और छात्र-छात्राओं, जिनमे भारतीय भी शामिल थे, से विचार-विमर्श के अतिरिक्त मेरा सामना वहां के समाज, संस्कृति और आर्थिक प्रगति के उन विभिन्न पहलुओं से हुआ जिससे हमारे देश के अधिकांश लोग अपरिचित हैं| यह अल्पावधि की यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही और इसने मुझे झंझोड़कर रख दिया| नई दिल्ली स्थित वीजा आवेदन केंद्र, जहाँ मुझे एक-दो बार जाना पड़ा, पर दो दर्जन से अधिक काउंटर बनाए गए थे जो भारत से चीन जाने वाले लोगों के वीजा आवेदन को स्वीकार कर रहे थे| वहां पर मौजूद भारतियों की भीड़ देखकर एक पल को तो ऐसा लगा कि सारा का सारा भारत चीन यात्रा पर जाने के लिए उतावला हुआ जा रहा है|

शैन्ड़ोंग एयरलाइन्स की दिल्ली से कुनमिंग जाने वाले विमान में मैंने पाया कि यात्रा के दौरान चालक दल के एक सदस्य ने कई बार विमान के अगले हिस्से से पिछले हिस्से का चक्कर लगाया| उसके हाथ में एक कमरे से लैस छोटा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण था जिससे वह यात्रियों की गतिविधियाँ, संभवतः सुरक्षा कारणों से,  दर्ज कर रहा था| विमान के लगभग दो तिहाई यात्री भारतीय थे| कुछेक से बात-चीत करने से ज्ञात हुआ कि ज्यादातर के हाव-भाव से उनके व्यापारी होने का पता चल रहा था| सामान्य बात-चीत से यह भी ज्ञात हुआ कि कुछ भारतीय छात्र व्यावसायिक अध्ययन के लिए भी चीन के शहरों का रुख कर रहे थे| ऐसी ही एक छात्र से बात करने पर मालूम चला कि वह डॉक्टरी की पढाई के लिए चिनान जा रही थी| जब मैंने उससे चीन के विश्वविद्यालय में शिक्षा के स्तर पर सवाल किया तो उसने बताया कि वह इसलिए चीन में अपनी पढाई कर रही है क्योंकि भारतीय संस्थानों में उसे प्रवेश नहीं मिल सका और वह अपना समय बचाना चाहती थी|

कुनमिंग हवाई अड्डा और बी.आर.आई. काउंटर

जब मैं यूनान प्रान्त की राजधानी कुनमिंग के छांगछुई हवाई अड्डे पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ बेल्ट एण्ड रोड देशों के लोगों के लिए एक अलग काउंटर बनाया गया था| चूँकि मुझे पता था कि भारत बी.आर.आई. का हिस्सा नहीं है, इसलिए मैं विदेशी लोगों की कतार में खड़ा होकर अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करने लगा| मुझे क्या पता था कि जल्द ही भारत को (मुझे) जबरन बी.आर.आई. का हिस्सा बनाया जाएगा (यह व्यंगात्मक टिप्पणी है)| मेरे हाथ में भारतीय पासपोर्ट देखकर एक सुरक्षा अधिकारी ने मुझे बी.आर.आई. वाली कतार में खड़ा होने को कहा| मेरे पास कोई दूसरा रास्ता न था, इसलिए मैंने बी.आर.आई. काउंटर पर जाना ही उचित समझा| अगले 10 मिनट में मैं हवाई अड्डे से बाहर निकला जहाँ मेरे मेजबान मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे| हवाईअड्डे से होटल जाते समय मेजबानों से हुई अनौपचारिक बात-चीत से मुझे सामान्य होने में मदद मिली और मैंने काफी राहत भी महसूस की| उनके द्वारा हवाईअड्डे पर किए गए स्वागत के तरीके से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता था| एक मेजबान, जो साथ में फूलों का गुलदस्ता भी लाया था, ने भारतीय परिधान पहन रखा था—कॉटन का कुर्ता जो मेरे द्वारा पहने गए कुर्ते से मिलता-जुलता था|

शहर की चकाचौंध

वैसे तो दक्षिणी पश्चिमी भाग को मुख्य चीन से बुनियादी ढांचे और आर्थिक मामलों में कम विकसित माना जाता है, लेकिन वहाँ की चकाचौंध से कोई भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता| पूरे साल रहने वाले सुहावने मौसम के कारण कुनमिंग को “सिटी ऑफ स्प्रिंग” या “सिटी ऑफ़ इटर्नल स्प्रिंग” भी कहा जाता है| यह शहर न तो बीजिंग है और न ही शंघाई और इसलिए इसकी तुलना दिल्ली और मुंबई से करना बेमानी है| हालाँकि, योजनाबद्ध विकास, आधारभूत संरचना और सुविधाएँ, हरियाली, साफ़-सफाई और स्वच्छ हवा की मौजूदगी इसे दिल्ली से कई मायनों में बेहतर बनाती है| गगनचुम्बी इमारतों की बेशुमार संख्या, साफ़-सुथरी और चौड़ी सड़कों और अन्य सुख-सुविधाओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारत चीन से कोई चार-पाँच दशक पीछे है|

सामान्य तौर पर वहाँ सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस नहीं दिखाई पड़ती है क्योंकि पूरी ट्रैफिक व्यवस्था इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से मानीटर की जाती है| सी.सी.टी.वी. कैमरों के अतिरिक्त मुख्य सड़कों और हाइवे पर उच्च क्षमता वाले और कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) से लैस कमरे लगाए गए हैं जो हर आने-जाने वाली गाड़ियों और उन्हें उपयोग करने वाले लोगों पर न केवल नज़र रखते हैं बल्कि उनकी तस्वीरें भी उतारते रहते हैं| हाइवे पर जगह-जगह गतिमापक डिजिटल परदे लगे हुए हैं जिस पर नज़र पड़ते ही गाड़ी की गति खुद बी खुद पता लग जाती है| शहरों के अन्दर की सड़कें अत्यंत साफ़-सुथरी हैं और ज्यादातर लोग इलेक्ट्रॉनिक बाइक से चलते हैं| दिल्ली की तुलना में इन इलेक्ट्रॉनिक बाइकों में अधिक शक्तिशाली इंजन लगे हैं जिससे सड़क पर बेहतर पिक-अप और गति मिलती है|

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पार्क 1903, शिछान 

संगोष्ठी में चीनी विद्वानों से विचार-विमर्श 

संगोष्टी में मुझे भारत-पाकिस्तान संबंधों पर अपने विचार रखने थे और मुझे आशंका थी की चीनी विद्वान मुझसे विवादास्पद सवाल पूछेंगे| हालाँकि सार्वजानिक रूप से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| संगोष्ठी में मौजूद चीनी विद्वान और शोधकर्ता एक अच्छे श्रोता साबित हुए| संगोष्ठी में तीन भारतीय छात्रों से भी मुलाक़ात हुई जो वहाँ पर शिक्षा ग्रहण करने गए हैं| सामान्यतः उन्होंने ब्रिटिश भारत के विभाजन और पाकिस्तान के बनाने से संबंधति ऐतिहासिक प्रश्न पूछे| उन्होंने पाकिस्तान के प्रति भारत के बदलते रवैये पर भी उत्सुकता भरे सवाल पूछे| संगोष्ठी के उपरांत कुछ चीनी विद्वानों ने व्यक्तिगत रूप से यह जानना चाहा कि भारत चीन के बी.आर.आई. से क्यों असहमत है और उसका विरोध क्यों कर रहा है| उन्होंने आतंकवाद से निपटने में भारत की रणनीति पर भी सवाल पूछे| मैंने भारत के आधिकारिक रुख से उन्हें न केवल परिचित कराया, बल्कि इस सन्दर्भ में भारत की चिंताओं, संवेदनाओं और संप्रभुता सम्बन्धी मुद्दों से भी अवगत कराया| व्यक्तिगत तौर पर हुई अनौपचारिक बात-चीत से मुझे लगा कि चीन में लगभग सभी लोग बी.आर.आई. को लेकर मनोग्रहीत (औब्सेस्ड) हैं| इस परियोजना को सभी लोग चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग द्वारा शुरू किया गया महान और अद्वितीय उपक्रम मानते हैं| लोग शी चिनपिंग के अतिरिक्त किसी और नेता का नाम तक नहीं लेते हैं| उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि लोग उन्हें जीवनपर्यंत अपना नेता मानने को तैयार हैं|

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कुनमिंग का संगोष्ठी कक्ष

पर्यटक स्थलों पर व्यापार का स्थानीय प्रारूप    

चीन ने न केवल अपनी ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को संजोकर रखा है, बल्कि देशी और विदेशी सैलानियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे क्षेत्रों को समुचित रूप से विकसित भी किया है| अपने इस अल्प चीन प्रवास के दौरान मैंने मुख्य रूप से च्युश्यांग प्राकृतिक क्षेत्र और प्राचीन डाली शहर के पर्यटक स्थलों को देखा| कुनमिंग से च्युश्यांग प्राकृतिक क्षेत्र और प्राचीन डाली शहर जाते हुए रास्तों में प्रकृति की अनुपम छटा के दर्शन होते हैं| पहाड़ों के बीच से गुजरता हुआ हाइवे आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराता है| च्युश्यांग प्राकृतिक क्षेत्र, कुनमिंग शहर से लगभग 90 किलोमीटर दूर यिलियांग में स्थित है| यह  अद्भुत एवं अद्वितीय कार्स्ट गुफाओं तथा तंग नदी घाटियों से भरा हुआ है तथा यहाँ पर चीनी परिपाटी और सांस्कृतिक परिदृश्य का सम्मिश्रण देखने को मिलता है| यद्यपि यह पूरा क्षेत्र प्रकृति की देन है लेकिन इसे कुछ इस तरह से विकसित किया गया है कि यहाँ आने वाले सैलानियों को इस पूरे क्षेत्र में घूमने और प्राकृतिक छटा का आनंद लेने में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े| यहाँ की साफ-सफाई किसी को भी आकर्षित कर सकती है| पूरे पर्यटक स्थल पर कूड़े-करकट का नामोनिशान तक न था|

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च्युश्यांग प्राकृतिक क्षेत्र

यहाँ की संकरी गुफाओं और घाटियों में चीन के स्थानीय व्यापार मॉडल से भी सामना होता है| इस क्षेत्र में कुछ चित्रोपम स्थल भी हैं जहाँ पेशेवर छायाकार सैलानियों को मुफ्त में तस्वीर खिंचवाने के लिए बुलाते रहते हैं| जो भी अपनी तस्वीर खिंचवाते हैं उन्हें चाभी के छल्ले में एक बहुत ही छोटी फोटो लगाकर मुफ्त में दी जाती है और जो उसके बड़े प्रतिरूप चाहते हैं, उन्हें 40 चीनी युवान (लगभग 400 रुपए) का भुगतान करना पड़ता है| चूँकि यह तस्वीरें बहुत ही आकर्षक होती हैं, इसलिए लोग उन्हें अक्सर खरीद लेते हैं| मैं भी इस मुफ्तखोरी का शिकार हुआ और 40 युवान देकर बड़ी तस्वीर ली| कुछ इसी तरह का वाकया तब पेश आया जब मैं रोपवे में बैठकर प्राकृतिक छटाओं का आनंद लेते हुए गुफा से बहार आ रहा था| एक अंतर यह था, कि इस बार मेरी बिना इजाजत के ही तस्वीर खींच ली गयी थी|

हमारा अगला पड़ाव प्राचीन डाली शहर था| हमारे मेजबानों में एक, जो हमारे साथ डाली गया, बहुत बातूनी था| उससे अनौपचारिक बात-चीत से मुझे चीन के लोगों और उनके समाज के बारे में बहुत सी अच्छी और कुछ कम अच्छी बातों का पता चला| कुनमिंग से प्राचीन डाली जाने वाली सड़क उसी हाइवे का हिस्सा है जिसे चीन अब बी.आर.आई. के अंतर्गत बी.सी.आई.एम. (बांग्लादेश, चीन, इण्डिया और म्यांमार) का भाग बनाना चाहता है|

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डाली द्वार

भारत, जो पहले इस परियोजना के लिए तैयार था, अब चीन द्वारा बी.आर.आई में शामिल किए जाने के कारण इसके लिए सहमत नहीं है| हमारे बातूनी मेजबान ने कई बार यह जानने की कोशिश की कि भारत क्यों बी.आर.आई. का हिस्सा नहीं बन रहा है, और क्यों अब उसे (भारत) बी.सी.आई.एम. में कोई रूचि नहीं है| कुनमिंग से डाली जाने वाली सड़क कहीं-कहीं सुरंगों से होकर गुजरती है| तीन-चार किलोमीटर लम्बी पहाड़ों को काटकर या उसमे छेद करके बनाई गई सुरंगे, चीन के लोगों की मेहनत और उनकी प्रगति को दर्शाता है| इन लम्बी सुरंगों में कृत्रिम प्रकाश के अतिरिक्त ताज़ी हवा लाने के लिए बड़े-बड़े पंखे लगाए गए हैं| कई जगहों पर पहाड़ों को काटकर या उनमे छेद करके नई सड़कें बनाई जा रही हैं| कुछ जगहों पर तो पहाड़ों को समतल करके खेती के लिए उपयोग किया जा रहा है| रास्ते में हमें कृषि के लिए बड़े-बड़े व्यावसायिक फॉर्म भी दिखे| सामान्यतया, इन व्यावसायिक फॉर्म को बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ संचालित करती हैं| वह या तो इन्हें खरीद लेती है या किराए पर निश्चित समय के लिए ले लेती हैं| इन खेतों में फसल के लिए जरुरी सभी तरह की चीज़ें (बीज, खाद, पानी) कम्पनियाँ उपलब्ध कराती हैं और किसानों/मजदूरों को निर्देशित करती हैं कि किस तरह से खेती के कार्य में ज्यादा से ज्यादा निपुणता प्राप्त की जाए और उसका उपयोग कम लागत में अधिक उपज के लिए किया जाए|

जब हम डाली शहर के नजदीक पहुंचे, तो हमने देखा कि पूरा का पूरा पहाड़ बड़ी-बड़ी पवनचक्कियों से भरा हुआ है| मुझे बताया गया कि उन पवनचक्कियों के एक पंख 20 मीटर से अधिक बड़े थे| कुछ जगहों पर मुझे सड़क किनारे लगे खम्बों में सौर उर्जा के पैनल के साथ-साथ छोटी-छोटी पवनचक्कियाँ लगी हुईं थीं जो सड़कों के आस-पास रौशनी करने के काम आती हैं| इससे यह भी पता चलता है कि चीन अब उर्जा के नवीकरणीय श्रोतों पर अपनी निर्भरता बढ़ा रहा है और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन कर रहा है| एक अन्य बात जिसने मुझे काफी आश्चर्यचकित किया वह थी भीड़-भाड़ वाली जगहों पर भी शोर-शराबों का आभाव| सामान्यतः पर्यटन स्थलों और बाज़ारों में जमा भीड़ के कारण  शोर-शराबा आम होता है| लेकिन चीन में ऐसा बिल्कुल भी नहीं था| साथ ही देर रात में भी चीनी युवतियां बिना किसी सुरक्षा सम्बन्धी चिंता के पर्यटन स्थलों के आस-पास छोटे-मोटे सामान बेच रही थीं| यह मेरे लिए अपने आप में एक नया अनुभव था|

वर्ष 2015 में चीनी राष्ट्रपति शी चिन्पिंग जब यूनान प्रान्त गए थे तो अपने लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि हरे पहाड़ और साफ़ पानी हमारे लिए सोने-चाँदी से कम नहीं हैं, इसलिए इनका संरक्षण करना अनिवार्य है| चीनी लोगों, जो अपने नेता की बहुत इज्जत करते हैं, ने इसे पूरी तरह से आत्मसात कर लिया है| इसकी झलक हमें उनके पर्यटन स्थलों में मिलती है जहाँ किसी भी तरह की गंदगी और कूड़े का नामोनिशान तक नहीं मिलता है| डाली में अर्खाइ झील और वहाँ की पर्वतमालाएँ इसकी गवाही देती हैं|  अर्खाइ झील के किनारे एक स्थान पर यह लिखा हुआ था कि “हमें अर्खाई माँ को अपनी आँखों की तरह ही बचाए रखना है|” यह ठीक उसी तरह है जैसा कि भारत में नदियों को माँ का दर्जा दिया जाता है| अर्खाई झील में मछली पकड़ना भी मना है| पूरे साल में केवल एक बार किसी बड़ी कंपनी को एक निश्चित समय के लिए ऐसा करने की इजाजत दी जाती है|

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अर्खाई झील, डाली

आम लोग और व्यवस्था

चीनी लोग समय के बड़े पाबंद होते हैं और एक तरह से मशीनी समयनिष्ठ होते हैं| भारत में हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने की दिनचर्या अपनाने वाले लोग स्वस्थ, संपन्न और बुद्धिमान होते हैं| चीन में सामान्यतः आम लोग कुछ इसी तरह की दिनचर्या अपनाते हैं| जल्दी उठना और जल्दी सो जाना उनकी जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा है| मैंने यह बात भी महसूस की कि आम तौर पर पर स्थानीय लोग विदेशी पर्यटकों से हिलते-मिलते नहीं है और न ही बात-चीत में दिलचस्पी दिखाते हैं| यहाँ तक कि युवा छात्र-छात्राएं भी विदेशी सैलानियों से बात-चीत करने से हिचकिचाते हुए दिखे| इस सन्दर्भ में हमारे द्वारा भी किए गए प्रयासों का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला| या तो यह भाषायी विकलांगता (अंग्रेजी न जानने) के कारण है या चीनी व्यवस्था के अंतर्गत हुई उनकी ट्रेनिंग का परिणाम है|

चीन के ज्यादातर विश्वविद्यालय तीन या चार वर्षीय पूर्वस्नातक पाठ्यक्रम (अंडरग्रेजुएट कोर्स) ही संचालित करते हैं और शिक्षा पर आने वाला खर्च सामान्य लोगों के लिए वहन करना आसान नहीं है| एक वर्ष में एक पूर्वस्नातक छात्र/छात्र को लगभग बीस हजार चीनी युवान या दो लाख भारतीय रुपए फीस के रूप में अदा करने पड़ते हैं| केवल कुछ गिने-चुने उच्च गुणवत्ता वाले विद्यार्थियों को ही उनकी पढाई जारी रखने के लिए वजीफा मिलता है| शायद यही कारण है कि अधिकतर लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बजाए रोजगार पाने को ज्यादा तरजीह देते हैं| ऐसी व्यवस्था चीन में श्रम आधारित उद्योगों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाती है|

च्युश्यांग प्राकृतिक क्षेत्र से लौटते समय हम लोग रास्ता भटक गए और एक स्थानीय बाज़ार से होते हुए निकले| अचानक यहाँ आकर ऐसा लगा कि शहर और पर्यटन स्थलों की चकाचौंध कुछ मद्धिम पड़ने लगी और अब हम शहर के बाहर की उपनगरीय (सब-अर्बन) और ग्रामीण जीवन की झलक देख पा रहे थे| थोड़ा आगे बढ़ने पर देखा कि आस-पास के खेतों में कुछ किसान/मजदूर काम कर रहे थे, तो कुछ छोटी-छोटी घोड़े-गाड़ी/खच्चर-गाड़ी/गधा-गाड़ी में सब्जियाँ ढो रहे थे| निकट के बाज़ारों में बड़ी संख्या में पुरानी कारें बिकने के लिए खड़ी थीं, लेकिन उनको खरीदने वाले ग्राहक नदारद थे| कमोबेश यही हाल वहां मौजूद दूसरी अन्य दुकानों का भी था|  बाजारों में छाए इस  सन्नाटे ने हमें चीनी अर्थव्यवस्था में आ रहे ठहराव की ओर इशारा किया| शहर के बाहर हमें पानी की कमी का भी अहसास हुआ| जब हम सड़क किनारे एक ढाबे पर जलपान के लिए गए तो वहाँ के पुराने तरीके से निर्मित शौचालयों में पानी की एक बूँद भी नहीं थी और वह काफी गंदे भी थे|

मेहमाननवाजी और खाद्य संस्कृति

चीन यात्रा से पहले मुझे लगता था कि एक भारतीय के लिए पाकिस्तानी सबसे अच्छे मेहमाननवाज होते हैं| लेकिन अब मैं उस सूची में चीनियों को भी जोड़ सकता हूँ क्योंकि वह भी इस मामले में पाकिस्तानियों से बहुत पीछे नहीं हैं| उन्होंने हमारे ठहरने से लेकर खाने-पीने तक का अच्छा इंतजाम किया था| मेरे शाकाहारी होने ने निश्चित रूप से उनकी और मेरी दोनों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं, लेकिन मेरी जरूरतों का उन्होंने यथासंभव खयाल रखा| इन बातों के बावजूद, एक महत्वपूर्ण अंतर जरुर है जिसे आप पल-पल महसूस करते हैं| स्थानीय आम नागरिकों द्वारा गलियों, सड़कों और दुकानों में आपके साथ होने वाला बर्ताव दोनों देशों में बिल्कुल अलग है| पाकिस्तान में आपको विदेशी होने का शायद ही अहसास हो, लेकिन चीन में आपको हर लम्हा यह अहसास होता रहेगा| 

शाकाहारी व्यंजनों की चीन में उपलब्धता पर तो कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता, हाँ उनके मसालों और पकाने के तरीकों ने स्वाद में बड़ा अंतर ला दिया था| वहाँ हमने मशरूम के कई प्रकारों को देखा, कुछ को चखा भी| एक वेगन भोजनालय में हमने बहुत से भारतीय पकवान भी मिले, लेकिन उनमे भारतीय स्वाद नज़र नहीं आया|

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डाली में एक भोजनालय

अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति

चीन में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को कुछ विशेष चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| जब कभी भी बात-चीत के दौरान उनका जिक्र आया तो मैंने यह महसूस किया कि कहीं न कहीं बहुसंख्यक लोग उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और उनके प्रति भेदभाव करते हैं| उन्हें इ-पीपल, वा-पीपल, और बाई-पीपल जैसे नामों से  बुलाते हैं| मुझे चीन के अन्दर सड़क मार्ग से यात्रा करने के दौरान पहाड़ो पर छोटे-छोटे मंदिरनुमा संरचनाएं दिखाई दीं, जो वास्तव में मरे हुए अल्पसंख्यक लोगों की कब्र थी| बात-चीत में पता चला कि अब अल्पसंख्यक लोग अपने मरे हुए लोगों को दफना नहीं सकते क्योंकि सरकार ने जमीन और पहाड़ों को बचाने के लिए इस पर रोक लगा दी है|


निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि चीन का एक वैश्विक ताकत के रूप में उभरना कोई कपोल कल्पना नहीं, बल्कि एक यथार्थ है| चीन के अनुभव और विशेषज्ञता से बहुत कुछ सीखने की जरुरत है| प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन, सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण, प्राकृतिक स्थलों को पर्यटन के लिए उपयुक्त बनाना और उन्हें साफ-सुथरा रखना चीन की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं| हालाँकि इसका यह कत्तई मतलब नहीं है कि चीन के समक्ष कोई समस्या और मुद्दे नहीं हैं| बुनियादी तौर पर दिखाई देने वाले विकास का चरमोत्कर्ष संभवतः हो चुका है और इस सन्दर्भ में अब बहुत कुछ किया नहीं जा सकता| चीन की अर्थव्यवस्था में अब एक तरह का ठहराव दिखाई दे रहा है और शायद यही वजह है कि उससे निपटने के लिए और आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए वह बी.आर.आई. जैसे बड़े बहुराष्ट्रीय परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है| इस कारण, चीन में हर कोई बी.आर.आई. में रूचि ले रहा है और इसे सफल होते देखना चाहता है|


डॉ. आशीष शुक्ल

आई.सी. डब्ल्यू. ए.







  

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