भारत-पाकिस्तान का करतारपुर कनेक्शन- डॉ. श्रीश पाठक

स्रोत: एनडीटीवी


लोकतंत्र की विडंबना यह है कि सत्ता की निरंतरता की चाह दलों को अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए अंततः सबकुछ दाँव पर लगाने को उद्यत कर देती है और दल सत्ता के लिए ऐसा करने भी लग जाते हैं। दल, सत्ता के अपने पाँच सालों में लगभग हमेशा ही कुछ यों अपनी गतिविधियाँ रखते हैं कि उन्हें चुनाव में इसका फायदा अवश्य मिले। भारत-पाकिस्तान संबंध भी सीमा के दोनों ओर की सरकारों की इस मानसिकता से लगातार प्रभावित होता रहा है। पंजाब, जो कि सीमा के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देशों का महत्वपूर्ण राज्य है, संबंधों की इस अनिश्चितता से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला नागरिक-समुदाय है। खालिस्तान-संघर्ष का भयावह अध्याय इसमें सुरक्षा व आतंकवाद के महत्वपूर्ण तत्व भी जोड़ता है, जिससे सरकारें और भी एहतियात बरतती हैं और संबंधों में एकप्रकार की ठंडी जड़ता पसरी रहती है। इन ठिठके रिश्तों में सहसा एक हलचल हुई जब भारतीय पंजाब के राज्य सरकार के एक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने क्रिकेटर मित्र इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने पाकिस्तान पहुँचे और मंच पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले लग गए। यह तस्वीर और विडियो सीमा के दोनों ओर सनसनीखेज रही और दलों ने भी जमकर इसपर छींटाकशी की। गौरतलब है कि भारतीय पंजाब में अभी कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार है और केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार आरूढ़ है। भाजपा और कांग्रेस ने बयानों की रस्साकशी शुरू कर दी और नवजोत सिंह सिद्धू बेतहाशा ट्रोल किये जाने लगे। सिद्धू, चूँकि भाजपा के स्टार प्रचारक रह चुके हैं और हाल ही में उन्होंने कांग्रेस से खुद को जोड़ा है तो यों भी उनपर ट्रोलर्स मेहरबान थे। लेकिन जब सिद्धू ने यह कहा कि कमर बाजवा ने उनसे यह कहा कि आख़िरकार पाकिस्तानी सरकार करतारपुर गलियारा खोलने पर विचार कर रही है तो उनसे रहा नहीं गया और झूमकर उन्होंने बाजवा को गले लगा लिया तो इस बात ने सियासत को एक अलग ही मोड़ दे दिया। पंजाब के जो भाजपा नेता अभी सिद्धू की देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर नुकीली आलोचना कर रहे थे, उन्हें भी अपना स्वर संयत करना पड़ा क्योंकि मामला अब सिख धर्म से जुडी भावनाओं से जुड़ गया था। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत केंद्र की मोदी सरकार भी सकते में थी क्योंकि इस आशय का कोई संचार फ़िलहाल पाकिस्तानी सरकार ने भारत की सरकार से नहीं किया था। 

विभाजन के समय कई बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल पाकिस्तान की सीमा में आ गए थे जिसमें गुरद्वारा जनम अस्थान ननकाना साहिब, पंचमुखी हनुमान मंदिर कराची, कटसराज मंदिर पंजाब, क्राइस्ट चर्च रावलपिंडी, सेंट कैथेडरल कराची, गुरद्वारा डेरा साहिब लाहौर, हिंगराज मंदिर बलूचिस्तान, सेक्रेड हार्ट कैथेडरल लाहौर, हसन अब्दाल स्थित गुरद्वारा पंजा साहिब और गुरद्वारा करतारपुर साहिब प्रमुख हैं। यों तो भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों में इतने हिलोर रहे हैं कि दोनों देशों के नागरिकों के लिए अपने-अपने धार्मिक स्थलों पर पहुँचना एक बेहद कठिन बात रही है लेकिन सितम्बर 14, 1974 को दोनों देशों ने ‘प्रोटोकॉल ऑन विजिट्स टू रिलीजियस श्राइन्स’ पर हस्ताक्षर किये जिसमें एक निश्चित वीजा व समय के लिए चिन्हित धार्मिक स्थलों पर जाया जा सकता है। हालाँकि, संबंधों के बनते-बिगड़ते आयामों के बीच इस सुविधा में भी नानुकर होती रही, पर यह भी सच है कि शांतिकाल में प्रतिवर्ष दोनों ही ओर से लाखों श्रद्धालु आवागमन करते हैं। गुरद्वारा करतार साहिब को पहला गुरद्वारा होने का गौरव प्राप्त है जहाँ गुरु नानकदेव ने अपनी लगभग 25 बरस की यात्रा (जिसमें उन्होंने श्रीलंका, तिब्बत, ईरान, बंगाल तक की खाक छानी) के बाद जीवन के आख़िरी 18 बरस एक किसान की तरह बिताया था। कहते हैं कि अपने समकालीन कबीर की तरह ही इनके प्रयाण पर भी हिन्दुओं और मुस्लिमों में विवाद हो गया था और कबीर की तरह ही गुरु नानक के पार्थिव शरीर के स्थान पर कुछ फूल मिले जिसे लेकर समाधि भी बनी और कब्र भी। गुरु नानकदेव ने कबीर की ही तरह सभी धर्मांधों की कटु आलोचना की और जीवनपर्यंत यह संदेश देते रहे कि सभी धर्म अपने शुद्धतम रूप में एक ही सच कहते हैं। यह करतारपुर ही था, जहाँ गुरु ने सभी भेदभावों को मिटाकर लंगर की प्रथा कायम की जो आज सिख धर्म की बेहद महत्वपूर्ण विशिष्टता है। इसलिए ही, करतारपुर साहिब, सिख धर्म के प्रत्येक अनुयायी के लिए एक बेहद धार्मिक स्थल है जहाँ जाने की हसरत सभी श्रद्धालुओं को होती है। भारतीय श्रद्धालु अपनी यह हसरत उन दूरबीनों  से देखकर भी पूरी करते हैं जो जिला गुरदासपुर में स्थित डेरा बाबा नानक गुरद्वारे पर दर्शन हेतु लगाई गयी है। अटल बिहारी वाजपेयी अपनी लाहौर बस यात्रा में पहली बार करतारपुर साहिब गलियारे की चर्चा करते हैं और लगभग पिछले 25 वर्षों से सीमा के दोनों ओर से इस सन्दर्भ में प्रयास जारी थे। पाकिस्तान के नरोवाल जिले में स्थित करतारपुर साहिब गुरद्वारा और डेरा बाबा नानक गुरद्वारा में महज 4 किमी का फासला है पर रावी नदी यहीं बीच में भारत-पाकिस्तान की सीमा बनाती है। एक चुनाव रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इसी सीमा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस को सिख भावनाओं की कद्र होती तो करतारपुर साहिब भारतीय सीमा में होता। यह बेहद ही खतरनाक और हास्यास्पद बयान है यदि इतिहास के पन्नों को न भुलाया जाय। जाहिर है, मोदी सरकार को बिलकुल अंदेशा नहीं था कि पाकिस्तान की नयी इमरान सरकार यदि करतारपुर गलियारा खोलने को राजी होती भी है तो उसका संदेसा पहले सिद्धू को मिलेगा और धार्मिक भावनाओं के दबाव में मोदी सरकार इस अवसर को मना भी नहीं कर सकती थी। गौरतलब है कि 22 नवम्बर से गुरु नानकदेव का 550वां प्रकाशवर्ष भी प्रारम्भ हो गया है जिसकी तैयारी जोरशोर से चल रही और मोदी सरकार ने भी इसे  भव्यता से मनाने का निर्णय लिया है और भारत सरकार को अपनी ओर से भी करतारपुर गलियारा के शिलान्यास का निर्णय लेना पड़ा। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा का पशोपेश में होना सुषमा स्वराज के उस बयान से बखूबी झलकता है जहाँ वह कहती हैं कि करतारपुर गलियारा खोलने पर पाकिस्तान सरकार की सहमति आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत, पाकिस्तान से शांति वार्त्ताओं के लिए तैयार हो जायेगा। यकीनन, आज जो नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में होते तो भारत सरकार इसे पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2, ट्रैक-3 नीति की शांति प्रयासों से जोड़ती और चुनावों में बड़ी सकारात्मकता से उतरती। भाजपा से कांग्रेस में गए नवजोत सिंह सिद्धू के हाथ इस इक्के के लग जाने से अब कांग्रेस में उनकी स्थिति मजबूत तो हुई ही है, पंजाब में भी उनके लिए एक गुडविल बनी है। 

भारत की तरफ से करतारपुर गलियारे का शिलान्यास करते हुए नितिन गडकरी ने इसे चार-पाँच महीने में ही पूरा कर लेने का दावा किया, जिससे बिना वीजा के श्रद्धालुओं की आवाजाही हो सके। इसी मंच से बोलते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन अटकलों का जवाब दिया जिनमें गलियारे की आतंकवादियों द्वारा सुरक्षा संबंधी दुष्प्रयोग का अंदेशा जतलाया गया है। उन्होंने पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा को कड़ी चेतावनी दी और कहा कि पंजाबी लड़ना जानते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की यह चिंता वैसे जायज है कि इस गलियारे का दुष्प्रयोग संभव है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब इसे खोलने की सूचना सीधे पाकिस्तानी जनरल कमर बाजवा की ओर से सबसे पहले आती है वह भी पाकिस्तान के नयी सरकार के शपथ ग्रहण के अवसर पर, तो निश्चित ही यह इमरान सरकार का फैसला नहीं लगता। पाकिस्तान में यों भी विदेशी मामलों में सरकार से अधिक सेना की चलती है और इमरान सरकार सेनापरस्त सरकार मानी भी जाती है। ऐसे में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की एक चिंता यह भी है कि यह पाकिस्तानी सेना का एक गेमप्लान भी हो सकता है। एक वीजाफ्री गलियारा दोनों ओर के खालिस्तानी अतिवादियों को भी मौका देगा और यह देशव्यापी आतंकवाद का भी एक जरिया बन सकता है। दो देशों के बीच जब तनावपूर्ण संबंध होते हैं और संयोग से वे एक-दूसरे के पड़ोसी होते हैं तो न शांति के प्रयास थामे जाते हैं और न ही सुरक्षा व ख़ुफ़िया तैयारियों में कोई ढील दी जाती है, इसलिए इस आशंका के समानांतर किसी भी प्रकार के शांति प्रयासों को रोका नहीं जा सकता और सरकार दूसरी ओर इस गलियारे के लिए अपनी सुरक्षा तैयारियों पर भी गंभीरता से काम अवश्य करे।

करतारपुर साहिब गलियारा, भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नयी ऊर्जा फूंक सकता है जो सीमा की दोनों ओर की सरकारें गंभीर हों। पाकिस्तान में नयी सरकार आ चुकी है और भारत में नयी सरकार आने को है। पाकिस्तान के साथ भारत की एक कशमकश यह रहा करती थी कि वार्ता किससे की जाय पर अभी इमरान खान ने गलियारे का अपनी तरफ से शिलान्यास करते हुए ठीक ही कहा कि सरकार, सेना और नागरिक समाज सारे ही इस मुद्दे पर एक पेज पर हैं। इमरान खान का एक पर्सनल कनेक्ट भी सिख धर्म से है। इमरान खान जबसे महान बाबा फरीद के अनुयायियों के संपर्क में आये हैं, खासे आध्यात्मिक हुए हैं और इन बाबा फरीद के महत्वपूर्ण उद्धरण नानकदेव के गुरुग्रंथ साहिब में ही पहली बार मिलते हैं। बचपन से इमरान खान जिस मेला मियांमीर में शिरकत करते रहे हैं और उनकी माँ की कब्र जिस मियांमीर की कब्र के पास है उन्हीं मियांमीर ने गुरु अर्जनदेव के आग्रह पर अमृतसर स्थित हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखी थी। गुरु नानकदेव ने अपने जीवन के तमाम वर्ष कई देशों की सीमायें लांघते हुए शांति का पाठ पढ़ाने में व्यतीत किया, उनके 550वें  प्रकाशवर्ष के अवसर पर भारत-पाकिस्तान शांति का एक नया सोपान प्रारम्भ कर सकते हैं। यह गलियारा पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था को धार्मिक पर्यटन के रूप में लाभ पहुँचायेगा। क्षेत्र में रूस की मंशा अमेरिकी प्रभाव को सीमित करते हुए यह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत और चीन अपने पारस्परिक विवाद निपटाते हुए ईरान से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, चीन होते हुए रूस तक एक सशक्त ऊर्जा गलियारा बनायें जिससे क्षेत्र में अमेरिका पर निर्भरता कम हो। गौरतलब है कि ईरान, पाकिस्तान और चीन से रूस से रिश्ते अच्छे हैं और रूस, भारत से भी अपने रिश्तों में जान फूंककर अफगानिस्तान, ईरान के जरिये मध्य-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति पुख्ता करना चाहता है। भारत, संबंधों के इस वितान पर होने वाले सुखद संभावनाओं की अनदेखी नहीं ही कर सकता तो करतारपुर गलियारा एक महत्वपूर्ण प्रारंभन बिंदु हो सकता है। सिख डायस्पोरा की ताकत भी कनाडा, यूके, यूरोप सहित समूचे विश्वभर में है तो यह गलियारा इस सिख़-विस्तार को भी आकर्षित करेगा और अंततः भारतीय कूटनीति को लाभ भी पहुँचायेगा।   



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