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इंदिरा गाँधी व नरेंद्र मोदी: डिसाईजिव या डेकोरेटिव?


डॉ. श्रीश पाठक 

(कई स्तरों पर इंदिरा गाँधी और नरेंद्र मोदी की तुलना करना बेतुका होगा लेकिन विदेश नीति की जमीन इसके लिए आदर्श है।)

Image Source: Gambheer Samachar

राजनीति, निर्मम है। यह प्रशंसा व आलोचना दोनों की सीमा नहीं जानती। यहाँ, चर्चा ही चरम की होती है। अरुण जेटली ने इंदिरा गाँधी की तुलना हिटलर से की। यह तुलना, एक दूसरी तुलना की धारा का रुख बदलने के लिए की गयी थी, जिसमें नरेंद्र मोदी सरकार की कुछ कार्यप्रणालियों खासकर मीडिया मैनेजमेंट को देखते हुए दबे स्वर में उन्हें हिटलर सरीखा कहा गया। वैसे इंदिरा गाँधी को विश्व इतिहास के उतने पन्ने कभी हासिल नहीं होंगे, जितने हिटलर को आज भी होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि आज ‘प्रचुर मोदीमय माहौल’ में भी इंदिरा अपनी ख्याति का ‘प्रासंगिक आयतन’ अवश्य घेरती हैं। राजनीति में तुलनाएँ होती ही हैं क्योंकि राजनीति में चयन की ही प्रतिष्ठा है और चयन में तुलनात्मक प्रज्ञा अपनी भूमिका निभाती है। विदेश नीति के संबंध में गाँधी परिवार के सभी प्रधानमंत्रियों में यकीनन इंदिरा गाँधी की उपलब्धियाँ सर्वाधिक हैं, वहीं गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों में नरेंद्र मोदी के ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ की बेहद चर्चा की जा रही है। इंदिरा गाँधी जहाँ स्वयं को फ़्रांस के शतवर्षीय युद्ध की वीरांगना जॉन ऑफ़ आर्क की तरह महसूस करती हैं, वहीं नरेंद्र मोदी अपने छप्पन इंच के सीने के साथ उस मनोविज्ञान पर काम करते रहते हैं जिसमें लौहपुरुष सरदार पटेल को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने की इच्छा होती है। यहाँ नरेंद्र मोदी के पक्ष में दो तथ्य आ जुड़ते हैं। एक तो इंदिरा गाँधी के पंद्रह वर्षों के शासन के मुकाबले नरेंद्र मोदी के तकरीबन छह साल  निश्चित ही कम हैं। दूसरे, नरेंद्र मोदी शासन का प्रभाव समकालीन है। इसके साथ ही इंदिरा गाँधी के प्रारंभिक वर्ष अधिकांशतः जहाँ स्वयं की स्वीकार्यता स्थापित करने में ही लगे, वहीं स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आये नरेंद्र मोदी पहले दिन से ही सर्वस्वीकार्यता के रस में हैं। इंदिरा गाँधी जहाँ नेहरूकालीन गुटनिरपेक्षता के बाद चीन से हार, ताशकंद समझौते से उपजे झुंझलाहट एवं शीतयुद्ध के उष्ण वैश्विक माहौल में प्रधानमंत्री बनी थीं वहीं नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में और आर्थिक शांति की वैश्विक व्यवस्था में शपथ लिया था, जिसके निर्माण में गुजराल, बाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह तक के प्रयास शामिल थे। विदेशनीति के आधार पर दोनों की गयी तुलना, यकीनन उनके अन्य आयामों की भी सार्थक इंगिति करेगी।

भारतीय राजनीति में विदेश नीति का सूत्रधार सदा से ही प्रधानमंत्री रहा है। निर्णयन क्षमता की धाक ही अंततः असर बनाती है। निर्णयन क्षमता के निर्माण में व्यक्तित्व की प्रवृत्तियाँ बेहद ही महत्वपूर्ण हैं। इंदिरा गाँधी का बचपन जहाँ एक महत्वपूर्ण व्यक्ति की पोती, एक महत्वपूर्ण व्यक्ति की एकमात्र संतान, एक महत्वपूर्ण स्त्री व्यक्तित्व की भतीजी के रूप में और महात्मा गाँधी, रबीन्द्रनाथ टैगोर के दुलार में बीता वहीं नरेंद्र एक अति साधारण परिवार में जन्में जो अपनी रोज की जरूरतों के लिए भी जद्दोजहद करता था। पारिवारिक साहचर्य का सुख नरेंद्र को अभावों में ही सही, मिला जरूर पर अधिकतर जेलों में रहने वाले पिता और अक्सर बीमार रहने वाली माँ के बीच इंदिरा आर्थिक सुरक्षा में भी पारिवारिक साहचर्य की मोहताज रहीं। इसका जीवन पर प्रभाव देखें तो स्पष्ट दिखता है कि इंदिरा जहाँ जीवन भर परिवार को लेकर असुरक्षित रहीं और प्रयास करती रहीं वहीं नरेंद्र मोदी पारिवारिक बंधनों से खुद ही अलग हो गए। इंदिरा ने सार्वजनिक जीवन में जहाँ सादगी को अपनाया वहीं नरेंद्र मोदी ने चमक-धमक का जीवन अपनाया है। स्वास्थ्य संबंधी इंदिरा गाँधी की समस्याओं ने उन्हें और भी संकुचित किया, सत्ता के प्रारंभिक दिनों में उन्हें गूँगी गुड़िया भी कहा गया, वहीं नरेंद्र मोदी अपने शारीरिक सौष्ठव व स्वास्थ्य में प्रभावी रहे हैं, उनमें एक उत्कट आत्मविश्वास दिखता है। इंदिरा गाँधी की शिक्षा सोपान में यों तो जिनेवा, शांति निकेतन और ऑक्सफ़ोर्ड के वितान हैं, लेकिन इंदिरा प्रकृति में अकादमिक नहीं रहीं और उनकी शैक्षिक यात्रा कोई खासा सफल नहीं रही। दूसरी ओर अभावों में पले नरेंद्र मोदी की शिक्षा-दीक्षा का ठोस रिकॉर्ड इंटरमीडिएट तक मिलता है। इस बिंदु पर इंदिरा गाँधी एक बेहद लाभप्रद स्थिति पर हैं क्योंकि उनके पिता जवाहरलाल जेल में रहकर भी चिट्ठियों के माध्यम से तकरीबन 196 प्रभागों में विश्व इतिहास की बारीकियाँ समझा रहे हैं, जो विश्व-राजनीति को समझने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। किशोरावस्था में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से नरेंद्र मोदी का जुड़ना उन्हें जहाँ, सांगठनिक क्षमता, समसामयिक मुद्दों की समझ और महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के साहचर्य उपलब्ध करवाता है वहीं ऑक्सफ़ोर्ड के अपने दिनों में इंदिरा करीब से नाजी उभार, स्पेनिश गृहयुद्ध, सोवियत संघ का स्पेनिश गणतंत्र को समर्थन देना, जापान की चीन पर की गयी बर्बरता, आदि वैश्विक घटनाओं को समझ सकीं। अपनी किशोरावस्था में इंदिरा जहाँ वामपंथी विचारों की ओर झुकीं वहीं नरेंद्र दक्षिणपंथी विचारों से जुड़े। अठारह वर्ष के नरेंद्र मोदी का विवाह अवश्य हुआ किन्तु उन्होंने कुछ ही समय बाद इस वैवाहिक बंधन से स्वयं को मुक्त कर लिया वहीं उन्नीस वर्ष की इंदिरा के जीवन से माँ कमला नेहरू का साया उठ गया और वह काफी अकेली पड़ गयीं। पच्चीस वर्ष की उम्र में फिरोज गाँधी से विवाह के पश्चात् उन्हें अपने पिता जवाहरलाल की नाराजगी का भी शिकार होना पड़ा। दो पुत्र राजीव और संजय अवश्य इस विवाह की उपलब्धि रहे किन्तु विवाह असफल ही रहा। नरेंद्र मोदी जहाँ देशभर में संघ, परिषद् फिर भाजपा की विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भारतीयता व वैश्विक यात्राओं से विश्व की झलक पाते हैं वहीं इंदिरा गाँधी कांग्रेस से जुड़कर और आजादी के बाद पिता प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत सहयोगी के रूप में यही अनुभव प्राप्त करती हैं। यकीनन इसमें परिमाण और स्तरीयता का बड़ा अंतर है किन्तु इससे दोनों व्यक्तित्वों की घरेलु राजनीति को समझने की कला और वैश्विक मामलों में खासा अभिरुचि रखने की प्रवृत्ति का पता चलता है।

इंदिरा गाँधी का विश्व दो स्पष्ट ब्लॉक में बंटा हुआ है और उनपर पिता के गुटनिरपेक्षता की राजनीति को अगले स्तर पर ले जाने का दबाव एक ऐसे वक्त में है जबकि भारत के दोनों पड़ोसियों पाकिस्तान और चीन ने भारत के प्रति आक्रामक रुख रखा है और एक ब्लॉक का प्रमुख अमेरिका, पाकिस्तान और चीन दोनों ही के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है, क्यूबन संकट के पश्चात् शीत युद्ध अपने चरम पर है,  सोवियत प्रीमियर अलेक्सी कोसीजिन 1969 में अपनी पाकिस्तान यात्रा पर वित्तीय व रक्षा सहायता का वचन दे रहे हैं और सोवियत विचारधारा के स्तर पर चीन की आक्रामक नीतियों पर चुप्पी साधे हुए है। भारत की माली हालत खस्ता है और लालबहादुर शास्त्री जी अपने कार्यकाल में आईएमएफ से कर्ज लेने की कोशिश कर चुके हैं। अनाज की किल्लत है और इंदिरा हरित क्रांति की तैयारियों में हैं। नरेंद्र मोदी का विश्व, आर्थिक वैश्वीकरण की कूटनीतिक शांति का विश्व है। पिछली भारतीय सरकारों ने रूस और अमेरिका से संबंधों का एक संतुलन साधा है। विश्व धीरे-धीरे एकध्रुवीय से बहुध्रुवीयता की तरफ बढ़ रहा है और एकमात्र पारम्परिक विश्व शक्ति अमेरिका से सामरिक सहभागिता, न्यूक्लियर समझौता और आर्थिक समझौतों का वितान पिछली सरकारों ने निर्मित कर रखा है। ईरान और अमेरिका की तनातनी मद्धम पड़ गयी है और यूक्रेन संकट भी अब बीते दिनों की बात हो गयी है। पाकिस्तान में चुनी हुई शरीफ सरकार है जो अमूमन भारत-पाकिस्तान संबंधों की हिमायती है, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान में भारत के प्रति उदारवादी रुख रखने वाली सरकारें हैं। भारत, उदारीकरण के बाद अपने आर्थिक उभार के दौर में है और तेल की वैश्विक कीमतें अब खासा नीचे हैं। वैश्विक मुद्रा भंडार सहित भारत की निर्यात टोकरी प्रशंसनीय है और कुछ वर्ष पहले आया अमेरिका के सबप्राइम संकट का तनिक असर भी राष्ट्र पर नहीं पड़ा है।

अनाज संकट से जूझते देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की पहली विदेश यात्रा मार्च, 1966 में अमेरिका की हुई। वहाँ वे हरित क्रांति के लिए जरूरी तकनीक, मिश्रित बीज और तुरत के जरूरतों को पूरा करने के लिए खाद्यान्न आयात करने में सफल रहीं। इसके बाद अमेरिकी ब्लॉक में शामिल होने के दबाव से स्वयं को दूर रखते हुए इंदिरा ने वियतनाम युद्ध प्रसंग पर अमेरिका की आलोचना की। नरेंद्र मोदी, प्रारंभ में सुस्पष्ट थे कि भारत की विदेश नीति पड़ोस को प्राथमिकता देने से ही महत्वपूर्ण बनेगी। क्लीन स्लेट के साथ नरेंद्र मोदी ने अपने सभी प्रमुख पड़ोसियों को शपथ ग्रहण में आमंत्रित भी किया और साझा विकास का नारा दिया। शुरुआत बेहद ही सकारात्मक कूटनीति से शुरू हुई और अपनी बहुचर्चित विदेश यात्राओं की शृंखला की शुरुआत मोदी ने पड़ोसी राष्ट्रों से की परन्तु इससे पहले इस दिशा में कोई ठोस उपलब्धि होती, मोदी सरकार में अमेरिका से जुड़ने की जैसे एक होड़ सी मच गयी। उभरती बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को देखते हुए निवर्तमान सप्रग सरकार जहाँ गुटनिरपेक्षता 2.0 (NAM 2.0) की रणनीत्ति पर विचार करने लगी थी और सभी वैश्विक शक्तियों एवं क्षेत्रों में अपनी पहुँच को उद्यत थी, वहीं सहसा भारत, अमेरिका के साथ स्पष्टतया अधिक झुकाव रखने लगा। पुराने पारंपरिक साथी रूस, मोदी के कार्यकाल के प्रारंभिक वर्षों में इतना उपेक्षित हुआ कि रूस ने पाकिस्तान को हथियार देने की पेशकश तक कर दी। मोदी मित्र बराक के साथ जब मन की बात कर रहे थे, पुतिन, मोदी के योग दिवस भंगिमाओं का उपहास उड़ा रहे थे।

क्यूबन संकट के बाद विश्व की प्रमुख शक्तियाँ खासकर अमेरिका और सोवियत रूस इसपर सहमत थे कि व्यापक न्यूक्लियर परीक्षण अब सभी देशों के लिए उपलब्ध न हो। भारत जैसे देशों पर ‘परमाणु अप्रसार संधि’ पर हस्ताक्षर करने के लिए खासा दबाव बनाया गया। असमान प्रावधानों के तर्क से इंदिरा ने इस दबाव का सामना किया और डटी रहीं। आख़िरकार बाकी देशों ने भी यह तर्क समझा। आगे चलकर ‘व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि (सीटीबीटी)’ पर भी भारत का यही रुख रहा। ’प्रशांत महासागर में अमेरिकी दिलचस्पी शुरु से रही है और हिंद महासागर व्यापारिक दृष्टिकोण से अहम् है। उभरते चीन को देखते हुए अमेरिका एक अरसे से चाहता रहा है कि भारत हिंद महासागर के साथ-साथ अब प्रशांत महासागर में भी सक्रिय हो। लेकिन भारत के लिए प्रशांत महासागर में सक्रिय होने का अर्थ है अपनी रक्षात्मक तैयारियाँ बढ़ाना, सो भारत इससे बचता रहा। लेकिन अमेरिका में ट्रम्प के आने के बाद पाकिस्तान, चीन, रूस और उत्तर कोरिया की जुगलबंदी के जवाब में अमेरिका ने आस्ट्रेलिया, जापान के साथ मिलकर एक सामरिक चतुष्क (QUAD) गढ़ा जिसमें भारत चौथे साझीदार के रूप में शामिल हुआ। भारत की यह खुलेआम एक सामरिक समूह से प्रतिबद्धता यह कहकर न्यायोचित ठहराई गयी कि भारत, आक्रामक चीन के रुख को अपने इस कदम से संतुलित कर रहा है और इससे भारत स्वयं को किसी भी समकालीन दबावों से मुक्त रख सकेगा। दोकलाम मुद्दे और मालदीव मुद्दे पर चतुष्क का परीक्षण भी हो गया। दोकलाम में जहाँ भारत-चीन एक-दूसरे से तिहत्तर दिन उलझे रहे वहीं मालदीव में चीन समर्थित सरकार ने आपातकाल लगा दिया और मालदीव के विपक्षी दल भारत से हस्तक्षेप की गुहार लगाते रहे। चीन ने मालदीव के मामले में दखल न देने की चेतावनी दी और भारत सहित चतुष्क के सभी साथी मौन रहे। बाद में जब उत्तर कोरिया के किम जोंग उल ने और अमेरिका के ट्रम्प ने सेंटोसा में शांति समझौतों की बुनियाद रखी तो यों भी चतुष्क की संरचना चरमरा उठी। माहौल भांपते हुए मोदी सरकार ने एक बार फिर रूस और चीन से अनौपचारिक भेंटवार्ता करनी शुरू की। उन्हीं दिनों दलाई लामा ने दिल्ली में थैंक यू इंडिया नाम से एक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई। कहीं चीन को बुरा न लगे, भारत सरकार की ओर से निर्देश दिया गया कि सरकार की ओर से कोई उच्च अधिकारी अथवा प्रतिनिधि इसमें परिभाग न करे, आख़िरकार लामा ने आयोजन ही रद्द कर दिया।

बंगाली शरणार्थियों की समस्या इंदिरा के समय में बढ़ती जा रही थी। पाकिस्तान, अमेरिका का शह पाकर लापरवाह होकर बंगाल दमन कर रहा था। इंदिरा ने एक तरफ सैन्य तैयारियाँ करनी शुरू की, दुसरी तरफ वैश्विक कुटुंब को इस समस्या के बारे में बार-बार आगाह किया। सोवियत संघ से एक समझौता किया जो युद्ध की स्थिति में सहायता के प्रावधानों से युक्त था। शीतयुद्ध के उस गरम माहौल में भी इंदिरा ने बंगाल अभियान अपने पक्ष में कर लिया। बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना, इसके किसी भी हिस्से पर भारत ने कब्ज़ा नहीं किया, इससे भारत की छवि विश्वसनीय बनी। नरेंद्र मोदी के समक्ष भी जोरशोर से रोहिंग्या शरणार्थी मुद्दे ने अपनी जगह बनाई। म्यांमार और बांग्लादेश दोनों देशों से हमारे बेहतरीन संबंध रहे हैं तो इस अर्थ में यह समस्या यकीनन एक कठिन समस्या थी। इस समस्या में दो पेंच भी थे, पहला ये कि मोदी की पार्टी भाजपा बांग्लादेशी शरणार्थी मुद्दे पर पहले से ही विरोध का पक्ष रखती है और दूसरा पेंच यह कि प्रशांत महासागर में पाँव बढ़ाने के अमेरिकी मंसूबे के अनुरूप भारत अपने ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत म्यांमार को एक बेहद महत्वपूर्ण देश की तरह देखता है तो उसकी सीधी आलोचना भी संभव नहीं थी । दक्षिण एशिया में अपनी एक महत्वपूर्ण साख रखने के चलते भारत को यहाँ दोनों देशों के साथ सार्थक मध्यस्थता करके इस मुद्दे के सर्वकालीन हल की तरफ बढ़ना था। यदि ऐसा होता तो भारत की विदेश नीति के आयामों में एक सार्थक अभिवृद्धि भी होती और साख और भी सुदृढ़ होती। पर मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर कुछ यों चुप्पी साधी कि अमूमन भारत के पक्ष में रहने वाली पार्टी अवामी लीग की सरकार वाली बांग्लादेशी हुकूमत भी भारत से नाराज हुई। अंततः इस समस्या का जैसे-तैसे बांग्लादेश ने स्वतंत्र स्तर पर सामना किया। यहाँ, यकीनन इंदिरा गाँधी अपने लिए एक माकूल अवसर तलाश लेतीं और यह समय भी शीत युद्ध जैसे हालातों का नहीं था तो उनके लिए संभवतः स्थितियाँ और भी सहज होतीं।  

बांग्लादेश अभियान के बाद जहाँ सोवियत संघ से भारत की नजदीकियाँ बढ़ीं वहीं पाकिस्तान, चीन की भारत के प्रति और भी नाराज़गी बढ़ी और पाकिस्तान व चीन अपनी पारस्परिकता में और भी करीब आये। अमेरिका भी खुलकर पाकिस्तान का हिमायती हो गया। भारत को अपनी सुरक्षा व संप्रभुता बचाये रखने की जोरदार कोशिश करनी थी। 1964 में चीन के परमाणु परीक्षण कर लेने से चीन-पाकिस्तान-अमेरिका का विन्यास भारत के समक्ष एक घातक चुनौती पेश कर रहा था। 1944 से ही भारत परमाणु तकनीक पर काम कर रहा था। इंदिरा, घातक चुनौती से निपटने के लिए परमाणु का रास्ता चुनने का मन बना चुकी थीं। परमाणु बमों के विरोधी भारत के अग्रणी वैज्ञानिक और एटॉमिक एनर्जी कमीशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष विक्रम साराभाई की मृत्यु हो चुकी थी और कमीशन के नए अध्यक्ष वैज्ञानिक होमी सेठना परमाणु बमों के हिमायती भी थे। अड़चन इतनी थी कि 1963 में भारत PTBT (आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि) पर हस्ताक्षर कर चुका था जिसके मायने ये थे कि सतह, जल और वातावरण में कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया जा सकता था। तय यह किया गया कि परीक्षण सतह नहीं बल्कि सतह के नीचे किया जायेगा और गोपनीयता इस स्तर की बरती गयी कि देश के रक्षा मंत्री को भी भारत के परमाणु राष्ट्र बनने की सूचना अख़बारों से मिली। आक्रामक इंदिरा ने परमाणु परीक्षण सुरक्षा और शांति के तर्कों से ही किया था, दिन बुद्ध पूर्णिमा का चुना गया था और ऑपरेशन का कोड नाम ‘स्माइलिंग बुद्धा’ रखा गया था। आख़िरकार चीन और अमेरिका के दबावों को दरकिनार करते हुए 18 मई 1974 को प्रातः 8 बजकर 5 मिनट पर जमीन के नीचे सफल परीक्षण किया गया और वैज्ञानिकों ने इंदिरा गाँधी को फोनपर खबर दी: ‘बुद्ध मुस्कुराये।’ सुरक्षा परिषद से इतर भारत वह पहला मुल्क बना, जिसके पास अब परमाणु की शक्ति थी। नरेंद्र मोदी ने कमोबेश कुछ इस तरह ही नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर अचानक ही सर्जिकल स्ट्राइक कर दी थी। इस स्ट्राइक के बारे में किसी को खबर नहीं थी जबतक भारत सरकार ने इसके बारे में स्वयं नहीं बताया। नियंत्रण रेखा के पार कितनी ही आतंकवादी बंकर बने हुए थे, जिसपर निशाना साधा गया था। बाद में मोदी सरकार ने इस सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो भी जारी किया। यकीनन जनवरी 2016 के पठानकोट आतंकी हमले के सात महीने बाद किये गए सर्जिकल स्ट्राइक अपने मकसद में कामयाब रहे, लेकिन इसके सरकारी उत्सवीकरण को सेना के जानकारों तक ने भी पसंद नहीं किया। इंदिरा गाँधी विदेश नीति मशीनरी ने बांग्लादेश अभियान के पहले जिस तरीके से भारत के पक्ष में माहौल तैयार किया था ठीक उसी तरीके से मोदी सरकार ने भी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, हेग के न्यायाधीशों के चुनाव में ब्रिटेन के प्रत्याशी के विरुद्ध दलवीर भंडारी की विजय, चाबहार प्रोजेक्ट, मध्य एशिया के देशों से संबंध, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना, आसियान राष्ट्रप्रमुखों को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित कर भारत की स्थिति सुदृढ़ की। 

1975 में सिक्किम राज्य का भारतीय गणराज्य में विलीनीकरण इंदिरा गाँधी की विदेश नीति की एक खास उपलब्धि मानी जाती है। हालाँकि इस विलीनीकरण में इंदिरा गाँधी ने साधनों की पवित्रता का मान नहीं रखा लेकिन इससे चीन और भारत के बीच एक दूसरे ‘तिब्बत’ जैसी परिघटना का निर्माण नहीं हुआ। नरेंद्र मोदी ने भी अपने एक वक्तव्य में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हो रहे मानवाधिकार हनन की घटनाओं का ज़िक्र करके पाकिस्तान को जरूर जता दिया कि मोदी का भारत लीक से हटकर भी सोचता है, जिसमें राष्ट्रहित ही साध्य है, साधन द्वितीयक हैं। मध्य-पूर्व एशिया में भारत सर्वदा ही एक सैद्धांतिक पक्ष ही लेता रहा, जिसमें अरब राष्ट्रों के मुकबले कभी खुलकर इजरायल को समर्थन नहीं दिया। आपस में लड़ते मुस्लिम राष्ट्रों से भी हमारे संबंध संतुलन में रहे किन्तु इजरायल की यात्रा करने वाले नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री बने। यहाँ, उपलब्धि यह रही कि भारतीय विदेश नीति को महज एक ही खाँचे में रखकर उसके विकल्पों को कम करना; अब बुद्धिमत्ता नहीं समझा गया। नरेंद्र मोदी वह प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने विदेश नीति की प्रखरता के लिए विदेश यात्राओं को खूब प्राथमिकता दी। पड़ोस में भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफग़ानिस्तान, चीन, म्यांमार, थाईलैंड हो या हिंद महासागर के प्रमुख देश हों या फिर विश्व शक्ति अमेरिका हो, महत्वपूर्ण रूस, जापान व दक्षिण कोरिया, ब्राजील, यूके, आस्ट्रेलिया हो, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, मध्य एशिया, मध्य-पूर्व एशिया के महत्वपूर्ण देश हों, नरेंद्र मोदी की यात्राओं ने यकीनन वहाँ संभावनाओं के द्वार खोले हैं। इंदिरा गाँधी जहाँ जापान की ओर से उदासीन रहीं वहीं नरेंद्र मोदी ने जापान से भारत के संबंधों में नयी गंभीरता भर दी है। 

इंदिरा गाँधी की ही तरह नरेंद्र मोदी रिस्क लेना चाहते हैं, महत्वाकांक्षी हैं और शासन-प्रशासन में निर्णायक भूमिका में ही रहना चाहते हैं। इंदिरा गाँधी, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की हिचक तोड़ती हैं तो नरेंद्र मोदी कई ऐसे देशों की यात्रा करते हैं जो भारत की पारंपरिक विदेश नीति के मानचित्र पर फ़िलहाल उपेक्षित थे। इंदिरा गाँधी सोवियत रूस से सैन्य समझौते की हिचक में नहीं हैं और उन्होंने अपना समाजवादी रुख छिपाया नहीं, नरेंद्र मोदी भी सचेत हैं और वेनजुएला, क्यूबा जैसे देश की यात्रा न करके अपना दक्षिणपंथी रुख बनाये रखा। इंदिरा गाँधी का शासनकाल जहाँ भारत के तकरीबन बीस प्रमुख व्यापारिक घरानों की प्रगति के लिए जाना गया वहीं मोदी सरकार पर भी अडानी-अंबानी परिवारों को अप्रत्यक्ष लाभ देने के आरोप लगते ही हैं। इंदिरा गाँधी के विदेश नीति निर्णयन में पी एन हक्सर, डी पी धर, जी पार्थसारथी, मोहम्मद यूनुस, रोमेश थापर, आई के गुजराल, नंदिनी सतपथी, पीताम्बर पंत, दिनेश सिंह, सी सुब्रमनियम  आदि ही उनके करीबी रहे और इन्हीं पर उनका विश्वास बना रहा। कश्मीरी मूल के लोगों को वह इसमें वरीयता दी गयी, उसीप्रकार नरेंद्र मोदी का भी एक विश्वस्त मंडल है जो अजित डोवाल, यस जयशंकर, नृपेंद्र मिश्र, पी के मिश्र, प्रदीप साहनी आदि से मिलकर बनता है और गुजरात कैडर के अधिकारी निश्चित ही इस सर्किल में स्थान बनाते रहते हैं। इंदिरा गाँधी की ही तरह नरेंद्र मोदी ने भी विदेश मंत्रालय को एक छाया मंत्रालय बना रखा है। नरेंद्र्र मोदी ने इंदिरा गाँधी की तरह बार-बार विदेश मंत्री तो नहीं बदला, मगर उसे महज औपचारिक तो बना ही दिया है। प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गाँधी और नरेंद्र मोदी दोनों की ही चर्चा बिना उनकी विदेश नीति के अधूरी है। 

इंदिरा गाँधी जहाँ मितभाषी थीं वहीं नरेंद्र मोदी काफी बोलते हैं। इंदिरा गाँधी की विदेश नीति की उपलब्धियाँ गिनाने योग्य हैं और अधिकांश इसपर सहमति व्यक्त करेंगे कि इंदिरा गाँधी की अनुपस्थित्ति में वह उपलब्धियाँ संभवतः एक चूके अवसर ही साबित होते। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की उपलब्धियाँ गिनाने को ऐसी नहीं हैं जो केवल और केवल उनके खाते में डाली जा सकें। मोदी यकीनन, विदेशों में भी एक आकर्षण बनते हैं, भारतीय डायस्पोरा उन्हें हाथोहाथ लेता है, उनके प्रधानमंत्रित्व के कुल आकर्षण का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा विदेश नीति के हिस्से में जाता है, मोदी निर्णायक प्रतीत होते हैं, स्थितियाँ उनके नियंत्रण से बाहर नहीं होतीं, ऐसा लगता रहता है, उनका प्रचारतंत्र उम्दा है वह बेहद करीने से माहौल रचता है, विदेश प्रभाग, देश के बाहर के भारतीयों की परेशानियों पर सक्रियता से काम करता है (ऑपरेशन राहत (यमन) और ईराक़ के उदाहरण समीचीन हैं), मोदी की अपनी हग डिप्लोमेसी (गले मिलकर स्वागत करना) ने प्रशंसा व आलोचना दोनों ही बटोरी है, मोदी अपनी वैदेशिक संबंधों के निर्वहन में एक व्यक्तिगत पुट अवश्य रखते हैं; लेकिन इससे एक ठोस विरासत नहीं बन रही। उनके विदेशों में दिए गए भाषणों में प्रासंगिक उद्धरण होते हैं जो बिलकुल सटीक जगह इस्तेमाल होते हैं और जिससे एक यूफोरिया भी निर्मित होता है, मोदी की गयीं अनथक यात्राओं का हासिल इतना अवश्य है कि संबंधों में सक्रियता आयी है, पर कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ है। 

इंदिरा गाँधी के भारत का पड़ोस, भारत पर लगभग निर्भर था। हिंदमहासागर पर भारत का प्राधान्य था। दोनों विश्वशक्तियों से भारत ने सहायता ली और एक से गहरे संबंधों में रहा। परमाणु शक्ति के निवारक से चीन को संतुलित किया तो बांग्लादेश अभियान से पाकिस्तान के दो टुकड़े ही कर दिए। नरेंद्र मोदी अपने पड़ोस में बुरी तरह विफल हैं। पाकिस्तान के साथ संबंधों में केवल गिरावट है। सार्क (दक्षेस), अपनी स्थापना के वर्ष से पहली बार इतना उपेक्षित हुआ कि वह पिछले साढ़े चार वर्षों में किसी भी प्रकार की कूटनीतिक चर्चा से ही अनुपस्थित है। नरेंद्र मोदी की पूर्ववर्ती सरकारें नाहक जिम्मेदारी बढ़ने की आशंका से जिस प्रशांत क्षेत्र में अपनी सक्रियता से बचती रहीं, मोदी सरकार ने समूचे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को ट्रम्प द्वारा ‘इंडो-पैसिफिक’ कहने को समर्थन दिया और उसके लिए आवश्यक सामरिक अनौपचारिक गठबंधन चतुष्क (क्वाड: अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान एवं भारत) में आना स्वीकार किया। यह चतुष्क अंततः फुस्स ही साबित हुआ। नेपाल, मालदीव, श्रीलंका और भूटान में भी भारत विरोधी स्वर अब सुनाई देने लगे हैं। एक्ट ईस्ट पॉलिसी की प्रगति संदिग्ध है और रक्षा समझौतों पर भ्रष्टाचार की काली छाया है। भारत के विश्वासपूर्ण संबंध न अब इसके पड़ोसियों से रह गए हैं, न रूस से, न अमेरिका से और न ही ईरान व सऊदी अरब से ही । चीन की ओबोर नीति का हमारे पास कोई जवाब नहीं है और न ही हिंदमहासागर में इस समय हम मजबूत दिख रहे। हालिया मालदीव संकट पर हम चुप रहे और यकीनन श्रीलंका में अभी उभरे संकट पर हमारी पहुँच नगण्य ही रही।  
 
दो अलग-अलग समयों और कार्यकाल अवधि का एकतरफा अंतर यकीनन नरेंद्र मोदी की इंदिरा गाँधी से तूलना करने को न्यायोचित नहीं ठहराता पर फिर भी कुछ विशेषणों से एक रूपरेखा गढ़ी जा सकती है। इंदिरा गांधी अपने तरीके से जहाँ डिसाईजिव (निर्णायक) हैं तो मोदी डेकोरेटिव (सज्जाशील) हैं। वह प्रीसाइज (सटीक) रहना पसंद करती थीं तो मोदी एलाबोरेटिव (वर्णनशील) हैं। इंदिरा जहाँ कांक्रीट (ठोस) में विश्वास करती थीं, वहीं मोदी एक सही टाइमिंग के साथ राइट नॉइज (सुघोष) पैदा करना चाहते हैं। इंदिरा अपनी रणनीतिक चाल में अग्रेसिव (आक्रामक) रहीं तो मोदी इसमें चौंकने की हद तक स्वयं को स्टीडी (अविचल)रखते हैं। इंदिरा अपने मकसद में जहाँ साइलेंट ऑपोरचुनिस्ट (मौन अवसरवादी) हैं तो मोदी वोकल पोलाइट (घोषपूर्ण विनम्र) हैं। रिजल्ट (परिणाम) जहाँ इंदिरा गाँधी की खासियत है वहीं मोदी शोमैनशिप (दृश्य विधा निपुणता) में यकीन करते हैं। इंदिरा की कार्यशैली में ‘इंडिया फर्स्ट’ की झलक मिलती है और नरेंद्र की कार्यशैली ‘मोदी फर्स्ट’ वाली है। विदेश नीति की केवल चर्चा हो तो यकीनन इंदिरा गाँधी, नरेंद्र मोदी से ही नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू से भी बीस पड़ेंगी। इंदिरा गाँधी जहाँ अपने पीछे एक लिगेसी (विरासत) छोड़ गयी हैं, नरेंद्र मोदी अपने दुसरे कार्यकाल में भी एक कोहरेंट विजन (सुसंगत परिकल्पना) के अभाव में विदेश नीति के सन्दर्भ में महज  रेफरेंसेज (उद्धरण) बनाकर विदा होंगे।  
 

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