सार्क: एक असहाय क्षेत्रीय संगठन-डॉ. शान्तेष कुमार सिंह

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दक्षिण एशियाई सहयोग संघ (सार्क) की स्थापना दक्षिण एशिया में एक ऐसे माहौल निर्माण के लिए हुआ था जिसमें सभी सदस्य राष्ट्र मिलकर शांति, विकास और खुशहाली की तरफ बढ़ सके. इसकी स्थापना 8 दिसम्बर 1985 में सात देशों के राष्ट्र्राध्यक्षों ने ढाका, बांग्लादेश में आपसी सहमति आधार पर किया था. इसका मुख्यालय काठमांडू, नेपाल में स्थापित किया गया है. इसमें 8 सदस्य राष्ट्र शामिल हैं, भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, भूटान और नव सम्मिलित सदस्य अफ़ग़ानिस्तान. 1985 से लेकर अभी तक इसकी 18 बैठके हो चुकी है और 19वी बैठक इस्लामाबाद, पाकिस्तान में 2016 में होने वाली थी जो भारत के शामिल ना होने के निर्णय के कारण निरस्त कर दी गई थी. जो पुनः इसी साल इस्लामाबाद, पाकिस्तान में आयोजित होने वाली है परन्तु यह बैठक एक बार फिर से भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस बयान के बाद में चर्चा में आ गया है कि भारत सार्क बैठक में हिस्सा नहीं लेगा क्योंकि पाकिस्तान का प्रायोजित आतंकवाद और संवाद साथ-साथ नहीं चल सकता. 2016 में पाकिस्तान में होने वाली 19वी बैठक में भारत ने पठानकोट, पम्पोर, उरी, बारामुलाहंदवारा, सोफ़िया और ज़कुरा में आतंकवादी हमलों को कारण भाग लेने से मना कर दिया था. बाद में बांग्लादेश, भूटान और अफ़ग़ानिस्तान ने भी बैठक में भाग लेने से मन कर दिया, जिससे बैठक रद्द कर दिया गया था.
भारत हमेशा से कहते आया है कि अगर पाकिस्तान वार्ता को लेकर वास्तव में गंभीर है तो उसे आतंकवाद पर ढोस कदम उठाने होंगे. भारत के इस कदम से एक बार फिर से सार्क के अस्तित्व पर गंभीर विवाद पैदा हो गया है. भारत ने ये कहते हुए सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया कि 2016 से आज तक पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ कोई भी संतोषजनक कार्यवाही नहीं किया है जिससे भारत,पाकिस्तान के साथ किसी भी वार्तालाप में भागीदारी नहीं करेगा. सार्क पर, एक संगठन के रूप में, ऐसे किसी भी कार्यवाही से नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है. क्या भारत का ऐसा निर्णय लेना सही है? भारत ऐसा क्यों कर रहा है? पाकिस्तान क्या सार्क बैठक को लेकर वास्तव में गंभीर है? अन्य सदस्य राष्ट्र क्या इन दोनों सदस्य देशो के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं? क्या सार्क, यूरोपियन युनियन और आसियान, की तरह सफल क्षेत्रीय संगठन नहीं बन सकता? ऐसे बहुत से सवाल है जो सार्क से जुड़े हुए हैं. 

ऐसा नहीं है की सार्क सम्मलेन पहली बार रद्द होने जा रहा है बल्कि इससे पहले भी 1989, 1992, 1994, 1996, 1999, 2000, 2001, 2003, 2006, 2009, 2012, 2013,  2015 और 2016 में सम्मलेन रद्द हो चूका हैं. हाँ, रद्द होने का कारण अलग-अलग रहे हैं. इसमें आपसी तनाव, आर्थिक कारण, संरचनात्मक अनुपलब्धता, घरेलूचुनाव, आन्तरिक संघर्ष इत्यादि प्रमुख रहे हैं, पर सार्क सम्मलेन भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद के कारण कई बार रद्द हुआ हैं. इसका सबसे बड़ा कारण इन दोनों सदस्य देशों के आपसी तनाव के विषयों को सार्क से अलग नहीं रख पाना हैं. दक्षिण एशिया क्षेत्र के ये दोनों देश आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली और प्रभावकारी देश है. अगर सार्क से इनको अलग कर दिया जाये तो सार्क एक प्रभावहीन संगठन बनकर रह जायेगा. भारत और श्रीलंका के बीच तनाव को लेकर ही 1989 से 1991 तक सार्क की कोई बैठक नहीं हो पायी थी. 1988 में सार्क बैठक को 'कोलम्बो' में होना था जो तमिल मुद्दे को लेकर इस्लामाबाद में आयोजित किया गया और तय किया गया कि 1989 की बैठक पुन: कोलम्बो में कराया जायेगा जो 1991 तक संभव नहीं हो सका. 1991 में श्रीलंका बैठक को लेकर तैयार हुआ परन्तु वह बैठक भी भूटान में आतंरिक तनाव और हिंसा के कारण रद्द कर दिया गया. जिसे पुन: एक महीने बाद 1991 में ही आयोजित किया जा सका. 

इसी तरह 1992 और 1994 में बांग्लादेश और भारत में होने सम्मेलन 1993 और 1995 में संपन्न हुए. 1995 में भारत में होने वाला सम्मेलन भी कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार को लेकर भारत ने रद्द कर दिया था. भारत ने 1999 में होने वाले काठमांडू सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया था क्योंकि भारत का कहना था की वह पाकिस्तान के सैन्य शासक के साथ मंच साँझा नहीं कर सकता है. उस समय पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व में सैन्य शासन की स्थापना हो चुकी थी. इसी तरह 2003 में पाकिस्तान में होना वाला सम्मलेन भी रद्द कर दिया गया था जिसे भारत ने पाकिस्तान की प्रायोजित आतंकवाद की कार्यवाही के सन्दर्भ में रद्द कर दिया था, जो 2004 में इस्लामाबाद में एक साल के बाद पुन: संपन्न हुआ. जनवरी 2005 में होने वाला सम्मलेन भी दक्षिण एशिया में सुनामी आने और नेपाल के आन्तरिक सत्ता परिवर्तन के कारण दो बार स्थगित किया गया. जो अंततः नवम्बर 2005 में ढाका में कराया गया. 

2006 में होने वाला सार्क सम्मेलन भी आतंरिक तनावों और आर्थिक अस्थिरता के चलते संपन्न नहीं हुआ. उसके बाद 2007 में नई दिल्ली में सार्क सम्मलेन कराया गया. जबकि मालदीव ने अपने यहाँ होने वाले चुनावो के लेकर 2008 में होने वाले सार्क सम्मलेन को संपन्न करने में असमर्थता जाहिर की जिससे सम्मेलन संपन्न नहीं हो सका. वही सम्मलेन 2010 में भूटान में आयोजित कराया गया. 2011 की बैठक मालदीव में कराना सुनिश्चित कराया गया और जो अददु शहर में संपन्न भी हुआ. 

2012 में नेपाल में होने वाला सम्मलेन आतंरिक अस्थिरता के चलते नवम्बर 2014 में सम्पन्न हो सका. 2014 की बैठक में निर्णय लिया गया की सार्क शिखर बैठक अब 2 साल या उसके अन्दर करायी जाएगी. जिसके चलते अगली बैठक 2016 में इस्लामाबाद, पाकिस्तान में करानी सुनिश्चित किया गया था. जो भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय तनाव के करण आज तक संपन्न नहीं हो सका है. जिसे दिसंबर 2018 में पुन: तय किया गया था, लेकिन लगता नहीं है कि ये सम्मलेन भी संपन्न हो सकेगा.

सवाल ये उठता है की क्या सार्क निरीह और नि:शक्त संगठन बन गया है? इससे ये तो कहा ही जा सकता है की जितनी उम्मीदे दक्षिण एशिया के देशों को थी उतनी सफलता तो निश्चित रूप से नहीं मिल रही है. इसके बावजूद सार्क की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता. आर्थिक रूप से इस संगठन ने बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं जैसे साफ्टा और साप्टा. 2014 में मुक्त व्यापार समझौता एक और बड़ी सफलता रही है. सार्क के अंतर्गत ही सांस्कृतिक, खेलकूद, पर्यटन जैसे प्रमुख विषयों पर समझौते हो सके हैं. सार्क के सदस्य देश अगर वास्तव् में आपसी द्विपक्षीय विवाद के मुद्दों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ सके तो यह संगठन ऐतिहासिक सफलताएं हासिल कर सकता हैं. लेकिन ऐसा होना इतना आसन नहीं लगता है. अब क्षेत्र के पारस्परिक विकास के लिए अन्य विकल्पों पर विचार करने का समय आ चुका है. इसमें सबसे बड़ा पाकिस्तान रहित दक्षिण एशिया संगठन की बात की जा रही है. जो कि प्रासांगिक नहीं लगता है. क्योकि किसी भी क्षेत्र का विकास वह सभी सदस्य देशो के सक्रीय सहभागिता से ही संभव है. पाकिस्तान को इस पर गंभीरता से विचार करना जरुरी है. क्योकि वो हमेशा से कहता आ रहा है की वो आतंकवाद पर ठोस कदम उठा रहा है लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है. उसे ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे वो अन्य देशो का विश्वास जीत सके और सार्क के में एक जिम्मेदार राष्ट्र की भूमिका निभा सके. इसीसे उसका और सम्पूर्ण क्षेत्र का विकास संभव हो सकता है. 

सार्क को प्रभावशाली बनाने के लिए इसके 1985 के समझौते में परिवर्तन करना होगा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर इस समय चीन एक ऐसा उभरता खतरा है जिसे सभी देशो को गंभीरता से लेना होगा. पाकिस्तान हमेशाही चीन के सहयोगी के रूप में उसे लाभ दिलाने की कोशिश करता रहा है. इसीलिए अभी हाल में ही चीन- दक्षिण एशिया फोरम की स्थापना की गई हैं जिसमें सार्क के सभी सदस्य राष्ट्र शामिल हैं. इस तरह के किसी भी कदम से चीन को फायदा होना तय है. वर्तमान में चीन के साथ सार्क के सभी सदस्य देशों का व्यापार संतुलन उनके विपरीत है चाहे श्रीलंका हो, मालदीव हो, पाकिस्तान हो या फिर भारत ही क्यों न हो. पाकिस्तान को भी चीन के महत्वाकांक्षा को समझते हुए सार्क राष्ट्रों के साथ अपने द्विपक्षीय सम्बन्ध मजबूत बनाने चाहिए. क्योंकि इसी से उसके राष्ट्रीय हित की पूर्ति हो सकती है. चीन के साथ सम्बन्ध बनाकर कोई भी राष्ट्र खुश नहीं रहा है इसके बहुत से उदाहरण अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में देखे जा सकते है. 

पाकिस्तान को समझना होगा की आतंकवाद को बढ़ावा देना उसके खुद के लिए नुकसानदायक है. आतंकवाद एक ऐसी वैश्विक समस्या है जिससे विश्व के सभी राष्ट्र पीड़ित हैं. ऐसे समय में पाकिस्तान को सभी के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को मज़बूत बनाना होगा, ना की उन्हें पनाह देना चाहिए. अगर वो ऐसा नहीं करता है तो ना सिर्फ दक्षिण एशिया में बल्कि सम्पूर्ण विश्व पटल पर अकेला रह जायेगा. जो उसके लिए किसी भी तरह से हितकारी नहीं रहेगा. ऐसा नहीं है कि अन्य देश उसके आतंकवाद समर्थन के कार्यवाही को नहीं जानते हैं . अमेरिका ने तो पहले ही उसे चेताया है और अब तो उसका खास दोस्त चीन भी उसे इस मुद्दे पर आगाह कर चुका है. जिससे भारत के अब तक के उठाये गए आतंकवाद विरोधी आवाज़ को बल मिलता है. 

दूसरा मुद्दा जो भारत उठाता रहा है वो है किसी भी देश के आतंरिक मामले में ह्स्तक्षेप का, परन्तु इसकी अवहेलना भी पाकिस्तान हमेशा से करता आया है. कश्मीर के मुद्दे पर आपसी सहमती के आधार पर निदान खोजने के बजाय कश्मीर में उग्रवाद को बढावा देकर हिंसा करवाता रहा हैं. जिसे भारत अपनी सम्प्रभुता पर हमला करार देता आया है. कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है पाकिस्तान को इस सच को स्वीकार करना चाहिए और इससे जुड़े किसी भी मुद्दे से दूर रहना चाहिए. इसी में उसकी भलाई हैं और समझदारी भी. सार्क को सफल संगठन बनना है तो इसे यूरोपियन  यूनियन और आसियान को आदर्श बनाना होगा क्योंकि ये दोनों ही संगठन आपसी तनाव के मुद्दों को भुलाकर ही आगे बढ़ सके हैं. एक दूसरे सदस्य देशों के प्रति सम्मान और सद्भाव के कारण ही ये दोनों संगठन आज सफल रहे हैं. ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र के देशों के बीच आपसी संघर्ष नहीं हैं यूरोपियन यूनियन के अंतर्गत फ़्रांस और इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी के बीच तनाव ऐसे ही उदारहरण हैं. इसी तरह के संघर्ष आसियान क्षेत्र में फिलिपिंस और इन्ड़ोनेशिया, वियतनाम और इन्ड़ोनेशिया के बीच देखने को मिलते हैं. इन तनाव के द्विपक्षीय मुद्दों को पीछे रखते हुए सभी सदस्य राष्ट्र आपसी हित के विषयों पर एकजुट होकर निर्णय लेते रहे है जिसके कारण ही ये संगठन सफल रहे हैं. सार्क को भी इसी तरह आपसी हित को प्राथमिकता देते हुए द्विपक्षीय संघर्ष के मुद्दों को त्यागना होगा. 

अंत में, इतना कहा जा सकता है कि कोई भी क्षेत्रीय संगठन तब सफल होता है जब वो शांति और विकास के लिए कार्य करे ना की अपनी तुच्छ महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए. सार्क को भी इसी दिशा में बढना चाहिए. पाकिस्तान को सदस्य राष्ट्रों को विश्वास में लेना होना होगा तभी सार्क अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सकेगा. इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसकी संभावनाएं भी हैं कि वो पाकिस्तान के परम्परागत नीतियों में परिवर्तन करके विकास और शांति के काम करेंगे. इमरान खान ने अभी एक इंटरव्यू में कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होने की बात कहने वाला कोई मुर्ख ही होगा. आगे उन्होंने कहा की अगर जर्मनी और फ्रांस अच्छे मित्र हो सकते है तो भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं. इस तरह की सकारात्मक बातें ही इस क्षेत्र को स्थिरता प्रदान करेंगी. करतारपुरकोरिडोर बनाने को लेकर पाकिस्तान की सहमती इसी सकारात्मक पहल की तरफ एक कदम है. पाकिस्तान को भारत की तरफ से उठाये जाने वाले संवेदनशील मुद्दों पर विचार करते हुए कार्यवाही करनी चाहिए. भारत तो हमेशा से आपसी वार्तालाप के माध्यम से समस्याओं के हल करने पर जोर देता रहा है. मोदी सरकार ने शुरू से ही पाकिस्तान के साथ शांति स्थापना के  प्रयास किये थे जो पाकिस्तान के आतंकवाद परस्त नीतियों और कश्मीर में हस्तक्षेप के कारण बाधित हो गई. अगर ये दोनों देश आपसी तनाव के विषयों पर सहमती के आधार पर हल निकलने में सफल रहते है तो इससे सार्क एक संगठन के रूप में निश्चित तौर पर आगे बढ़ सकेगा और अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों के पूरा कर सकेगा इससे सभी देश लाभान्वित होंगे. 

(लेखक, डॉ. शान्तेष कुमार सिंह, वर्तमान में, वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU-IIGH), कुआलालम्पुर, मलेशिया में कार्यरत हैं. 

E-mail; shanteshjnu@gmail.com, twitter; @shanteshjnu

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