बार्गेनिंग मोड में नेपाल- डॉ. श्रीश पाठक

Source: The Himalayan Times

स्वतंत्र संप्रभु देश की विदेश नीति जब गढ़ी जाती है तो उन प्रभावी कारकों की पड़ताल की जाती है, जिनकी अवहेलना नुकसानदायक हो सकती है। भारत की ओर से तीन तरफ से और चीन की तरफ से एक तरफ से घिरे नेपाल को भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की बुनियाद गढ़नी है। एक समय लगभग असंभव लग रहे संविधान-निर्माण की प्रक्रिया के सकुशल लोकतांत्रिक रीति से संपन्न हो जाने के पश्चात् नेपाल ने विधिसम्मत लोकतांत्रिक चुनाव आयोजित कर स्वयं को स्पष्ट बहुमत वाली नयी सरकार भी प्रदान कर दिया है। संगठित वामपंथ की सरकार के बनने से भारत के साथ नेपाल के संबंधों में वह जोश तो नहीं ही है, किंतु भारत-नेपाल संबंधों में आयी यह जकड़न दरअसल उस अविश्वास से उपजती है जिसका मूल नेपाली नवगठित ओली सरकार के चीन के प्रति दिखाई जा रहे झुकाव में है। चीन दुनिया की प्रमुख सामरिक-आर्थिक शक्ति है, न यह तथ्य नज़रअंदाज के काबिल है और न ही यह कि भारत तेजी से उभरती विश्व शक्ति है। चीन ओबोर नीति के आधार पर अपना खजाना खोले हुए है जो नेपाल की नवनिर्माण की आकांक्षा के लिए एक बेहद ही स्वाभाविक आकर्षण है। लोकतांत्रिक नेपाल आर्थिक मजबूती के लिए यदि भविष्य के व्यापारिक लाभों को लेकर उत्सुक है तो भारत की भी अवहेलना महंगी पड़ सकती है। अब जबकि, किसी एक देश पर निर्भरता भी भावी हितों को देखते हुए खतरनाक है, ऐसे में यदि भारत और चीन के संबंध भी सीधी रेखा में न हों तो नेपाल की कठिनाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। नेपाल अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत और चीन की भू-राजनीतिक स्थिति की भी अनदेखी नहीं कर सकता, यह उसकी विदेशनीति निर्माण-प्रक्रिया की प्राथमिक बाध्यता है। 

ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक संबंधों के संदर्भ में यदि नेपाल के भारत और चीन से संबंध परस्पर तौले जाएँ तो यकीनन भारत-नेपाल संबंध, नेपाल-चीन संबंध से अधिक स्वाभाविक, अधिक गहरे और कभी भी अपनी महत्ता नहीं खोने वाले नज़र आएंगे, किन्तु नेपाल भी अपने कूटनीतिक व सामरिक संबंधों में एक सुरक्षित संतुलन की सम्भावना तो तलाशेगा ही। इसी संतुलन की तलाश उसे चीन से नए-नए समझौतों की तरफ ले जाती है। कोई भी तटस्थ विदेश नीति विश्लेषक यदि नेपाल के दृष्टिकोण से विचारे तो यही कहेगा कि नेपाल अपनी स्वाभाविक चाल चल रहा है। मन में कहीं भूटान को रखते हुए भारतीय विश्लेषक जब नेपाल से भारतीय अपेक्षाओं की पड़ताल करते हैं तो उन्हें निराशा हाथ लगती है। लेकिन बदलती परिस्थितियों के हिसाब से भारतीय विदेश नीति में नेपाल के प्रति जो तत्परता आनी चाहिए थी उसकी अनुपस्थिति पर भी ध्यान जाना चाहिए। भारत और नेपाल के संबंध उतार-चढ़ावों के बावजूद अमूमन बेहतरीन ही रहे हैं। किन्तु जिस तरह बदलते नए नेपाल की नब्ज महसूस करते हुए भारत को अपनी नेपाल नीति को अद्यतन करना था, वह नहीं हो सका और भारत की नेपाल नीति में एक आलस्य व जड़ता बनी रही। भारत और चीन के मध्य स्थलबद्ध नेपाल एक सैंडविच की तरह महज बफर स्टेट तो नहीं बनना चाहेगा। नेपाल में नयी सरकार के शपथ लेने तक भारत सरकार को ‘नव-नेपाल’ को देखते हुए एक नयी व बहुआयामी नेपाल नीति तैयार रखनी थी जिसमें भूराजनीतिक कारक व चीनी संदर्भ तफ्सील से लक्षित होते। किंतु अभी तक भारतीय रवैया देखकर यही लगता है कि भारत, नेपाल के हर कूटनीतिक कदम पर चौंक ही रहा है।

2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद तथाकथित भारतीय सीमाबंदी के बाद नेपाली जनमानस ने एक राष्ट्र पर अतिनिर्भरता के दुष्परिणाम पर सोचने को मजबूर हुए। इसीसमय चीन ने भी तातोपानी में अपना एकमात्र व्यापारिक चेकपॉइंट यह कहते हुए बंद किया था कि वहाँ उन्हें चीन विरोधी गतिविधियों की आशंका है लेकिन नेपाली जनमानस पर फ़िलहाल राजसत्ता के विरुद्ध हुई क्रांति के वामपंथी नायक इतने प्रभावी हो चुके हैं कि उन्होंने चुनाव में तथाकथित भारतीय सीमाबंदी को अधिक तूल दिया। भारत-नेपाल मुक्त सीमा के दोनों ओर रहने वाले मधेसियों से भारतीयों की सामाजिक-सांस्कृतिक साम्यता और उनकी नेपाली राष्ट्रीय राजनीति में कम होती महत्ता ने भी इसमें जैसे आग में घी का काम किया। यही वह नाजुक समय था जब भारतीय कूटनीति को अधिक तत्पर व भारतीय उपस्थिति को अधिक मुखर होना था, किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका। नेपाल, चीन के ओबोर नीति को समर्थन देने वाले प्रथम पंक्ति के देशों में है। नवनिर्माण के आकांक्षी नेपाल को इसमें निश्चित ही अपनी अवसरंचना को नयी दिशा देने का अवसर दिखाई पड़ता है। चीन ने नेपाल में भारी-भरकम निवेश किया है और नयी-नयी घोषणाएँ भी जब-तब होती जाती हैं। चीन केरांग-काठमांडू रेल परियोजना पर काम कर रहा है और साथ ही परस्पर वायु व भूमि संपर्कों के फैलाव पर ध्यान दे रहा है। कोसी, गंडकी और करनाली आर्थिक गलियारे पर भी प्रगति देखी जा सकती है। 2017 में चीन ने नेपाल के लिए 8.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की घोषणा की थी। उसी साल प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए चीनी रक्षा मंत्री चांग वानक्वान ने 32.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता नेपाली सेना को देने की घोषणा की थी। पिछले वित्तीय वर्ष के शुरुआती दस महीनों में ही नेपाल में चीनी निवेश, नेपाल के कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का 87% है। हाल ही में चीन ने नेपाल के साथ नए ट्रांजिट प्रोटोकॉल के तहत अपने चार बंदरगाह तियानजिन, शेनजेन, लिआन्यूंगांग व झांजीआंग खोल दिए, इसमें तीन लैंझाउ, ल्हासा व शिगास्ते जैसे शुष्क बन्दरगाह भी शामिल हैं। इसके तुरंत बाद ही नेपाली सरकार ने भारत द्वारा आयोजित बिम्सटेक बे ऑफ़ बंगाल प्रथम संयुक्त सैन्य अभ्यास में परिभाग करने से सहसा ही इंकार कर दिया हालाँकि कूटनीतिक संबंधों को देखते हुए नेपाल ने अपना पर्यवेक्षक भारत भेज दिया। तथ्य यह भी है कि नेपाल इसी समय चीन के साथ सागरमाथा सैन्य अभ्यास के द्वितीय संस्करण में परिभाग कर रहा है।

इसतरह देखा जाय तो यह कहना मुनासिब होगा कि नेपाल अब एक स्वतंत्र सौदेबाज देश के रूप में व्यवहार कर रहा है। चीन के साथ वह यकीनन अपने संबंध प्रगाढ़ करना चाहता है परंतु भारत से अपने संबंधों को भी वह सम्हालना चाहता है। नेपाल के कूटनीतिक हलकों में भारत के सापेक्ष चीन को लेकर एक पक्षपात अवश्य है किन्तु अभी जो कूटनीतिक विश्वास भारत को लेकर है, वह चीन को लेकर नहीं है। यहीं भारतीय कूटनीति के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। चीन के भारी-भरकम निवेश पर एक तरह के ऋण-बंधन में फंसने का भय स्पष्ट है। श्रीलंका के उदाहरण से नेपाली कूटनीतिक समाज भी अवगत है। तथ्य यह भी है कि सन 2015 से ही नेपाल-चीन तातोपानी व्यापारिक सीमापॉइंट बंद है और एकमात्र रासूवगाड़ी-केरुंग पॉइंट अपने ख़राब अवसंरचना विकास के कारण सुस्त पड़ा है। इसके अलावा ध्यातव्य यह भी है कि नेपाल ने आख़िरकार पूर्वघोषित पश्चिमी सेती हाइड्रोप्रोजेक्ट में चीनी मदद को दरकिनार करते हुए खुद के संसाधनों से विकसित करने का निर्णय लिया है। चीन ने अवश्य ही स्थलबद्ध नेपाल के लिए अपने चार बंदरगाह खोल दिए हैं किन्तु नेपाली घरेलू मीडिया में यह भी विमर्श समानान्तर चल रहा है कि नजदीकी चीनी बंदरगाह भी 2600 किमी दूर है जबकि भारत का हल्दिया पोत काठमांडू के दक्षिण में महज 800 किमी की दूरी पर है। भारत-नेपाल सीमा से कोलकाता की दूरी जहाँ 742 किमी है, वहीं विशाखापत्तनम 1400 किमी की दूरी पर है। परेशानी भारतीय सीमा पर कस्टम संबंधी लालफीताशाही वाले प्रावधानों से है। एक स्रोत के अनुसार कोलकाता से जर्मनी के हैम्बर्ग जाने वाले कारगो के खर्च की तूलना में काठमांडू से कोलकाता जाने वाले कारगो का खर्च तीन गुना है। वैसे, नेपाली व्यापारी विशाखापत्तनम में हाल ही में प्रस्थापित इलेक्ट्रिक कारगो ट्रैफिकिंग सिस्टम से होने वाली सहूलियत से संतुष्ट हैं। नेपाल ने तिब्बत-सन्दर्भ में चीन से कहा है कि वह अपनी जमीन चीन-विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल नहीं होने देगा, इसीतरह उसने भारत को भी आश्वासन दिया है कि उसकी भारत के साथ खुली सीमा का दुरूपयोग आतंकवादी गतिविधियों में वह नहीं होने देगा।

नेपाल का कूटनीतिक रवैया अप्रत्याशित नहीं है कि उसे एक धोखबाज देश की तरह देखा जाय, किन्तु यकीनन नेपाल एक सौदेबाज देश के रूप में उभर रहा है। कहना होगा कि भारत ने नयी परिस्थितियों के अनुरूप तैयारियाँ नहीं कीं और इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भारत के तनिक सुलझे व गंभीर प्रयासों से परस्पर संबंधों में पुनः नयी ऊष्मा भी लाई जा सकती है। भारत और नेपाल का इतिहास व समाज एक-दूसरे का स्वाभाविक साझीदार बनाते हैं और भूगोल इसमें भारत को चीन के सापेक्ष नेपाल के लिए हमेशा ही वरीय देश बनाकर रखता है। इस स्थिति में भारत को अपना अवसर अवश्य ही साधना चाहिए। 

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