एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन- डॉ. श्रीश पाठक


Source: Haaretz

जिस दिन भारत अपनी आजादी की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने में मशगूल था उसीदिन अमेरिका के छोटे-बड़े तकरीबन साढ़े तीन सौ मीडिया-प्रतिष्ठानों ने  अमेरिकी प्रेस की आजादी के पक्ष में सम्पादकीय प्रकाशित किया । यह एक अभूतपूर्व घटना थी। पर कहना होगा कि यह उस अभूतपूर्व रवैये के विरुद्ध एकजुट प्रदर्शन था जो किसी भी अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति में यों नहीं रही । पिछले एक अरसे से मीडिया द्वारा हो रही अपनी हर आलोचना को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ‘फेकन्यूज’ कह रहे हैं और जोर देकर दुहराते हैं कि मीडिया द्वारा कहा गया, दिखाया गया कुछ भी तथ्य नहीं है। ट्रम्प के अनुसार मीडिया, विपक्षी दल की तरह व्यवहार कर रहा है और यह देशहित में नहीं है। ट्रम्प यहाँ तक कहने लगे कि मीडिया उनकी दुश्मन नहीं बल्कि देश की दुश्मन है। ट्रम्प अपने ट्विटर अकाउंट से बमबारी करते हैं तो उसी ट्विटर पर एकजुट अमेरिकी मीडिया द्वारा #एनेमीऑफ़नन कैम्पेन चलाया गया। बोस्टन ग्लोब की अपील पर अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस मीडिया विरोधी रवैये का एकजुट विरोध किया। 

कमोबेश पूरी दुनिया में सत्ता के साथ मीडिया के जो संबंध हैं वे बहुरंगी हैं। एक लंबे समय तक यह संबंध श्वेत-श्याम था। या तो मीडिया, सरकार की निर्भीक आलोचना करती थी अथवा स्वयं ही सरकारी बन उसका भोंपू बन जाती थी। बाजार की दखलंदाजी ने इस भूमिका में एक अवसरवादी संतुलन भर दिया था। सत्ता और शक्ति के खेल को परोसते-परोसते मीडिया खुद एक बड़ी किरदार हो गयी। इंटरव्यू लेने वालों के इंटरव्यू लिए जाने लगे। प्रश्नकर्ता, द्रष्टा व विचारक बनते गए, प्रश्न छूटते गए, दृश्य धुंधले होते गए और आयातित विचारों की बमबारी ही एजेंडे में शामिल हो गए। चुनाव जो कि एक लोकतांत्रिक उत्सव है अब मीडिया के लिए महज अवसर में तब्दील हो गया। समकालीन मीडिया एक रंगारंग मेला है। हर दुकान पर एक लाउडस्पीकर बंधा है। सारे लाउडस्पीकर चालू हैं चौबीस घंटे और चीख रहे हैं। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाउडस्पीकर चुन लिए हैं। उद्योगपतियों ने इन लाउडस्पीकरों की खरीददारी में मदद की है। अब अधिकांश लाउडस्पीकर वही रिकॉर्ड बजाने को मजबूर हैं, जो उन्हें पहुँचाया जाता है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का चुनाव, सांगठनिक रूप से पहला बड़ा सफल कैम्पेन माना जाता है जब मीडिया का इस्तेमाल खुलकर किया गया। पश्चिमी देशों में यह पहले हुआ, अपने देश में यह अब देखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी के चुनाव कैम्पेन में मीडिया की भूमिका से इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। प्रवृत्तियाँ काफी पहले से कार्यरत हैं, परन्तु यह दशक जैसे पर्दादारी जानता ही नहीं। बाजार का साथ पाकर मीडिया एक समय बाद स्वयं में ही एक औद्योगिक घराना बन जाता है। इस बिंदु पर आकर लाउडस्पीकर अपने रेकॉर्ड बजाने की भी हैसियत रखता है। ट्रम्प से वह संतुलन टूट गया है। भारत में यह संतुलन अगले दशक में टूट सकता है। राजनीतिक दल जो मीडिया का इस्तेमाल कर कैम्पेन करते हैं अब अपनी आलोचना के जवाब में मीडिया पर ही तंज कसते हैं। ट्रोलर्स की खेती करने वाले दूसरों के ट्रोलर्स को खर-पतवार बताते हैं। फेकन्यूज फिनोमेना अब एक आत्मघाती बम है।  

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