रियल पॉलिटिक मोदी और विश्व राजनीति-डॉ. श्रीश पाठक


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किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए विदेश नीति सर्वाधिक कठिन आयाम होती है। अनिश्चितता इसका निश्चित गुणधर्म है इसलिए इसमें सफलता और असफलता दूरगामी परिणाम तथा महत्त्व लेकर आती है। अपेक्षाकृत रूप से नरेंद्र मोदी सरकार को विश्व-राजनीति का एक कठिन समय नसीब हुआ है। पिछले दो दशकों में ऐसा नहीं था कि समस्याएं जटिल नहीं थीं लेकिन एक सर्वोच्च विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका की स्थिति सर्वमान्य थी। रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन आदि सहित यूरोप के राष्ट्र अमेरिका की पंक्ति में ही स्वयं को अनुकूल कर विकास के पायदान पर चढ़ने के हिमायती बने रहे। संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की दूसरे बड़े आर्थिक व सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कमोबेश अमेरिकी वित्त पर ही आधारित होते हुए कार्यरत रहे।  

स्थितियाँ एकदम से बदल नहीं गयी हैं, लेकिन पुतिन का रूस अब महत्वाकांक्षी राष्ट्र है, शी जिनपिंग का चीन ओबोर नीति से अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्ट रख रहा है, जापान अपनी शांतिपूर्ण विदेश नीति का मंतव्य छोड़कर सक्रिय विदेश नीति की ओर रुख कर चुका है। रूस, चीन, पाकिस्तान मिलकर एशिया में साझी रणनीति बना रहे। हिंदमहासागर और प्रशांत महासागर पर अमेरिका, रूस, चीन तीनों की बराबर नज़र है। जापान के सुझाव पर भारत को सम्मिलित करते हुए अमेरिका ने आस्ट्रलिया के साथ चतुष्क बनाने की कोशिश की और हाल ही में अपने बेहद खास पैसिफिक कमांड का नामकरण ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ कर दिया है। दक्षिण कोरिया ने अपने  कूटनीतिक करिश्मे का लोहा मनवाते हुए उत्कट उत्तर कोरिया के साथ सहयोग का नया आयाम विकसित करने में सफलता प्राप्त की और सिंगापुर में १२ जून को ‘डोनॉल्ड ट्रम्प-किम जोंग उन’ की बहुप्रतीक्षित भेंट होने की नींव तैयार की। रणनीतिक महत्त्व समझते हुए, रूस ने चीन द्वारा स्थापित दक्षिण-पूर्व क्षेत्र के प्रमुख आर्थिक सहयोग संगठन ‘शंघाई सहयोग संगठन’ का पाकिस्तान के साथ, भारत को भी  पूर्ण सदस्य बनवाने की सफल पैरवी की। 

मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति कई अवसरों पर जता चुकी है कि भारत न केवल अपनी वैश्विक भूमिका निभाने को तत्पर है अपितु अपनी एक ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का भी निर्वहन वह कर सकता है। अमेरिका के दबावों के बावजूद भारत रूस से एस-४०० मिसाइल तकनीक खरीद रहा है और  अमेरिका के द्वारा लगाए गए CAATSA प्रतिबंधों से भी अप्रभावित होकर रूस और ईरान से अपने व्यापारिक संबंध बनाये हुए है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के पूर्ण निर्माणकार्य के लिए भारतीय सहयोग अपनी सततता में है। हिंदमहासागर में जहाँ भारत अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस के सहयोग में है और आस्ट्रेलिया, जापान के साथ मालाबार अभ्यास से जुड़ा हुआ है वहीं मारीशस के पक्ष में चागोस मुद्दे पर भारत ने ब्रिटेन के हितों के विपक्ष में मत दिया। आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष मोदी के निमंत्रण को स्वीकार भारत की गणतंत्र परेड की शोभा बढ़ाते हैं वहीं मोदी म्यांमार और थाईलैंड के साथ मिलकर ‘एक्ट ईस्ट’ के नारे को अमली जामा पहनाने की कोशिश भी करते हैं। विरोधाभासों को साधते हुए मोदी हाल ही में संपन्न ‘शंघाई सहयोग संगठन’ के आयोजन में भारत को चीन के ओबोर अवधारणा के लिए चिंता व्यक्त करने वाले अकेले सदस्य देश के रूप में प्रदर्शित करते हैं तो कुछ समय पहले अमेरिका द्वारा एकतरफा जेरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर भारत का मत अमेरिका-इजरायल के विरुद्ध निर्धारित करते हैं। हाल ही में संपन्न हुई ट्रम्प और किम जोंग उन की उल्लेख्ननीय भेंट पर सधी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे एक ‘सकारात्मक विकास’ कहा और ऐसी उम्मीद लगाई कि परमाणुमुक्त कोरियन क्षेत्र की मंसा के अनुरूप भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) तक फैले संपर्कप्रसार सूत्र को भी दृष्टि में रखा जायेगा। 

चतुष्क और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की अमेरिकी जुगलबंदी के बीच यह सच है कि भारत को रूस के साथ अपनी पारम्परिक मित्रता कुछ परे रखनी पड़ी। इसका कारण यह भी रहा कि पुतिन का रूस, वह पारम्परिक रूस रहा भी नहीं। वैश्विक स्तर पर मोदी अपने सतत विदेश यात्राओं से जहाँ भारत की वैश्विक उपस्थिति बनाये रखी वहीं दक्षिण एशिया क्षेत्र में रूस-चीन-पाकिस्तान मैत्री ने भारत के लिए नयी चुनौतियाँ गढ़नी शुरू कीं। मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल सहित भारत के पड़ोसी देश कहीं न कहीं चीन के ओबोर आर्थिक फंदे में फंसते चले गए। इधर जब ट्रम्प के अमेरिका ने खासा स्वार्थी रुख अपना लिया और जी-७ के अपने सहयोगियों, यूरोपीय देशों और रूस, ईरान आदि के हितों से अधिक अमेरिकी हितों की स्वकेन्द्रित व्याख्या की तो रूस और चीन ने भी अपने वादों को लेकर अमूमन निश्चित रहने वाले भारत के प्रति अपना सहयोगी रुख फिर अपनाया। इशारा मिलते ही मोदी २७ अप्रैल को चीन के शहर वुहान में एक अनौपचारिक भेंट के लिए शी जिनपिंग के पास सहसा पहुँचे। चीन और भारत की इस एजेंडारहित अनौपचारिक भेंट का हासिल खासा उत्साहित करने वाला रहा। भारत और चीन, अफगानिस्तान में साझा अवसरंचनात्मक सहयोग को राजी हुए। डोकलम जैसी किसी स्थिति से बचने के लिए अपने-अपने सुरक्षा बलों को सामरिक दिशानिर्देश देने का फैसला लिया गया। पारस्परिक व्यापार संतुलन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी। मोदी ने इस अनौपचारिक भेंट के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए जिनपिंग को भारत आने का न्यौता दिया और दोनों नेताओं ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बनाने में अपनी आस्था प्रकट की। अनौपचारिक भेंट को एक नया कूटनीतिक पहल बनाते हुए पुतिन के निमंत्रण पर मोदी २१ मई को रूस के शहर सोची पहुँचे। इस भेंट को दोनों नेताओं ने ‘बेहद उर्वर’ और ‘सर्वआयामी’ करार दिया। मोदी ने जहाँ ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की सदस्यता की पैरवी के लिए पुतिन को धन्यवाद दिया वहीं मिसाइल कण्ट्रोल रिजीम के एनएसजी और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारतीय पक्ष की पैरोकारी के लिए आभार भी व्यक्त किया। हाल ही में चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रयासों में अपनी भूमिका निभाने की मंशा जताई है, यह एक संतोषप्रद विकास है। 

पिछले दशकों की भाँति विश्व-व्यवस्था सरल ध्रुवीकृत नहीं है। वैश्वीकरण के आर्थिक स्वरूप ने विश्व के देशों को एक जटिल अंतर्निर्भर व्यवस्था में कार्य करने को विवश किया है जिसमें सभी राष्ट्र, अपने ‘राष्ट्र-हित’ की अधिकाधिक आपूर्ति की मंसा रखते हैं। अनिश्चित वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में कूटनीति के सभी कदम समान रूप से लाभकारी नहीं होते लेकिन यह अवश्य कहना होगा कि भारत सरकार ने जिसप्रकार विदेश नीति को अपनी वरीयता में रखा है और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया सऊदी अरब, इजरायल, अफगानिस्तान सहित रूस, उत्तर कोरिया, चीन, ईरान आदि देशों के साथ जिसप्रकार अपने हित संतुलित किये हैं, वह आसान नहीं है।

*लेखक गलगोटियाज विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं।    

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