सेंटोसा से शांति-डॉ. श्रीश पाठक


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दुनिया भर से आये तकरीबन ढाई हजार से अधिक पत्रकार सिंगापुर के खूबसूरत द्वीप सेंटोसा में इस दशक की बहुप्रतीक्षित भेंट ‘डोनॉल्ड ट्रम्प- किम जोंग-उन’ के साक्षी बने और इस भेंट के एक प्रमुख सूत्रधार दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए-इन ने अमेरिका और उत्तर कोरिया के इस ‘सेंटोसा एग्रीमेंट’ को आख़िरी बचे शीतकालीन अवशेष को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका वाला बताया। यकीनन, विश्व कूटनीति का यह एक शानदार पड़ाव था। कोरियाई द्वीप 1910 से 1945 ई. तक जापानी नियंत्रण में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका-ब्रिटेन-सोवियत संघ के संयुक्त नेतृत्व में हिरोशिमा-नागासाकी की भीषण विभीषिका के बाद जापान ने पराजय स्वीकार कर ली तब कोरिया की सीमाओं से लगे सोवियत संघ और प्रमुख विश्व शक्ति अमेरिका ने कोरिया को विभाजित करने का निर्णय किया। 1950 में सोवियत संचालित उत्तर कोरिया के शासक किम इल-संग और अमेरिका द्वारा संचालित दक्षिण कोरिया के शासक सिंगमन री में समूचे कोरिया को हथियाने के लिए भयानक संघर्ष छिड़ पड़ा. अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री डीन एचेसन ने एक बार कहा था कि दुनिया के सबसे बेहतरीन विशेषज्ञों से यदि सबसे भयानक युद्ध स्थल के बारे में पूछा जाए तो एक स्वर में जवाब कोरियाई प्रायद्वीप होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन और चीन के माओ जेदांग किसी कीमत पर यह संघर्ष जीतना चाहते थे। 1953 में आख़िरकार युद्धविराम घोषित किया गया जिसमें 38वें समानांतर अक्षांश के उत्तर में नयी सीमा खींची गयी और उत्तर कोरिया व दक्षिण कोरिया के मध्य दो मील चौड़ा एक क्षेत्र छोड़ा गया जिसे ‘असैन्य क्षेत्र (DMZ)’ कहा गया। 

जबतक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा उत्तर कोरिया बड़ी तेजी से दक्षिण कोरिया की ही तरह प्रगति करता रहा लेकिन सोवियत संघ के विघटित होते ही उत्तर कोरिया विकास की होड़ में दक्षिण कोरिया से बहुत पिछड़ता रहा। किम इल-संग के बाद किम जोंग-इल के समय में उत्तर कोरिया एक बैरकों में बंद देश बनता गया और देश की पिछड़ती अर्थव्यवस्था ने गरीबी और बेरोजगारी को सम्हालने से हाथ खड़े कर दिए। जोंग-इल ने दमन और मिलिटरी मजबूती का दामन पकड़ा जिसमें घोषित-अघोषित रूप से रूस और चीन का साथ मिलता रहा। जोंग-इल के उत्तराधिकारी किम जोंग-उन ने जब 27 वर्ष की उम्र में बागडोर सम्हाली तो उत्तर कोरिया में एक बदलाव देखा गया, लेकिन जोंग-उन अपने देश के भीतर ही मिसाइलों और परमाण्विक आयुध विकास पर काम करते रहे। इस वक्त तक पुतिन और शी जिनपिंग के निर्बाध नेतृत्व वाले रूस और चीन अपनी बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा स्पष्टतया उजागर करने लगे। चीन, रूस और परमाणु आग्रही उत्तर कोरिया मिलकर एशिया में दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के द्वारा निर्मित शक्ति संतुलन को चुनौती देने लगे। अमेरिका के नेतृत्व में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया को मिलाकर एक अनौपचारिक सामरिक समूह चतुष्क (क्वाड) गढ़ा गया जिससे समूचे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रूस-चीन-उ. कोरिया संगति को संतुलित किया जा सके। भड़काऊ बयानों, मिसाइल परीक्षणों और रूस-चीन-अमेरिका के परस्पर मतभेदों से कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव कुछ कदर बढ़ा कि आये दिन विश्लेषक इस संघर्ष में नवशीत युद्ध की झलक निरखने लगे। मार्च, 2017 में उत्तर कोरिया के जापान की ओर चार बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण के बाद, अमेरिकी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने कहा कि विश्व शांति के विरुद्ध उत्तर कोरिया का भय एक नवीन चरण में प्रवेश कर चुका है। मई 2017 में ट्रम्प ने जोंग-उन को परमाणु हथियारों वाला ‘मैडमैन’ कहा। जून 2017 में अमेरिका ने उ. कोरिया पर प्रतिबन्ध लगाए और जुलाई 2017 में उ. कोरिया ने मिसाइल परीक्षण किया जिसकी जद में संभवतः अमेरिका का अलास्का प्रान्त आता है। सितम्बर, 2017 में संयुक्त राष्ट्र संघ में ट्रम्प ने उ. कोरिया को पूरी तरह तहस-नहस करने की चेतावनी दी और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उ. कोरिया पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाया। जवाब में किम जोंग-उन ने भी ट्रम्प को मासिक विक्षिप्त करार देते हुए कहा कि भयभीत स्वान भूँकता अधिक है। 

ट्रम्प अपनी विदेश नीति में जबसे खुलकर कारोबारी रुख अपना रहे हैं तब से उनके सहयोगी अपनी वैदेशिक नीतियों में खासा अनिश्चित हो रहे हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को अमेरिकी प्रभाव से लाभ है तो वैश्विक जिम्मेदारी मिलकर उठानी होगी। इससे पहले सहयोगी यह मानते रहे कि सुपरपॉवर शक्ति होने के नाते यह महज अमेरिका की जिम्मेदारी है। नवम्बर, 2017 में जब ट्रंप अपने बारह दिवसीय इंडो-पैसिफिक यात्रा में दक्षिण कोरिया पहुंचे तो उन्होने अपना यह रुख स्पष्ट कर दिया था। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जाए-इन, जो कोरियाई मैत्री के नारे से चुनकर सत्ता तक पहुंचे हैं, अपने देश की किसी वैश्विक कूटनीतिक भूमिका के लिए तैयार नहीं थे और उन्होने उ. कोरिया के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजा बेहद सकारात्मक रहा क्योंकि उ. कोरिया के नए तानाशाह शासक जोंग-उन अपने देश की चरमराती अर्थव्यवस्था से वाक़िफ़ हैं और दक्षिण कोरिया के मैत्री भाव से उत्तर कोरिया के अस्तित्व को लेकर जो उनकी असुरक्षा है, वह भी जाती रहेगी। मार्च, 2018 में अमेरिका और उ. कोरिया दोनों ने ट्रंप-किम भेंटवार्ता की संभावनाओं की घोषणा कर विश्व को चौंका दिया। 8 मई, 2018 को उ. कोरिया ने तीन अमेरिकी बंदियों को मुक्त किया तो ट्रंप ने मुलाकात की तारीख 12 जून तय कर दी। सहसा, उ. कोरिया ने 15 मई को दक्षिण कोरिया से चल रही अपनी वार्ता, प्रस्तावित अमेरिका-द. कोरिया मिलिट्री अभ्यास की चर्चा करके स्थगित कर दी। ट्रंप ने भी बेहद गुस्से और शत्रु भाव में एक चिट्ठी लिखकर 12 जून की प्रस्तावित भेंटवार्ता स्थगित कर दी। अंततः जब किम जोंग-उन ने पंगये-री के अपने न्यूक्लियर परीक्षण स्थल को खत्म करने की घोषणा की तो 1 जून को ट्रंप ने 12 जून की भेंटवार्ता को बहाल करने की घोषणा की। 

12 जून को ट्रंप और जोंग-उन ने जब सिंगापुर के सेंटोसा में 13 सेकेंड का अपना पहला हैंडशेक किया तो कोरियाई प्रायद्वीप, जापान सहित समूचे विश्व के लिए यह अभूतपूर्व क्षण था। इकहत्तर वर्षीय ट्रंप बेहद उत्साहित दिखे वहीं चौतीस वर्षीय जोंग-उन संयमित बने रहे। ट्रंप ने मुलाकात को बेहद सकारात्मक और उम्मीद से बढ़कर करार दिया वहीं जोंग-उन ने कहा कि यहाँ तक आने के लिए अतीत के फंदों से निकलकर आना पड़ा है। सेंटोसा समझौते में तीन महत्वपूर्ण विकास हुए। पहला, उ. कोरिया ने सतत व स्थायी शांति के लिए पूर्ण कोरियाई परमाण्विक निःशस्त्रीकरण पर अपनी प्रतिबद्धता जतायी। दूसरा, अमेरिका ने इसके बदले उ. कोरिया को सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। तीसरा, दोनों पक्षों ने एक नये संबंध की नींव रखने की मंसा प्रकट की। उत्साहित ट्रंप ने जोंग-उन को दक्षिण कोरिया के साथ चलने वाले अमेरिकी मिलिट्री ड्रिल बंद करने का आश्वासन भी दिया, जिसपर द. कोरिया ने चिंता भी व्यक्त कर दी कि सहूलियत बड़ी शीघ्रता से दी जा रही। इस भेंटवार्ता को दोनों नेता अपनी-अपनी उपलब्धि मानकर चल रहे हैं। ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में उतरना है और अपने किसी पूर्ववर्ती से अलग उ. कोरिया को सुरक्षा बंदोबस्त देने की बात कहकर वे अपने लिए एक माइलेज तो बना ही रहे हैं, वहीं किम जोंग-उन कुछ वैसा कर गए हैं जैसा कि उनके किसी पूर्ववर्ती तो क्या कोई कोरियाई सपने में भी सोच सकता था। 

यह समझौता विश्व शांति की दृष्टि से यकीनन एक मील का पत्थर है परंतु कुछ आशंकाएं अवश्य ही हैं। समझौते में समयसीमा और शर्तों पर कोई स्पष्टता नहीं है। समझौते के तुरंत बाद जहाँ ईरान ने यह कहकर चुटकी ली कि जोंग-उन को होशियार रहना चाहिए, ट्रंप अमेरिका पहुंचते-पहुंचते समझौता खारिज कर सकते हैं वहीं भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में समझौते की मुबारकबाद देते हुए उ. कोरिया के परमाण्विक सूत्र पर दृष्टि रखने की नसीहत दी जो कि भारत के पड़ोस (पाकिस्तान) में है। इस समझौता बैठक के बाद भी चीन और रूस की भूमिका एक मूक दर्शक की तो नहीं ही होगी। गौरतलब है कि किम जोंग-उन अपना पहला विदेशी दौरा मार्च, 2018 में चीन का ही किया था। मई, 2018 में एक बार फिर जोंग-उन, शी जिनपिंग से मिलने चीन गए। चीन और रूस इस समझौते से अमेरिकी खतरा क्षेत्र में कम होने से राहत की साँस ले रहे होंगे लेकिन क्षेत्र में अपनी भूमिका के स्थायित्व को लेकर अवश्य ही सजग होंगे। आने वाले समय में जबकि किम जोंग-उन ने अमेरिका आने का ट्रंप का न्यौता स्वीकार कर लिया है सेंटोसा से शांति का सबक तभी धुंधला नहीं पड़ेगा जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और उ. कोरिया सहयोग और शांति के अधिकाधिक आयाम विकसित करें और जापान, रूस के साथ-साथ चीन भी शांति में ही दूरगामी विकास की संभावना देखे। 

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