अनिश्चित ट्रम्प, उधेड़बुन में सहयोगी-डॉ. श्रीश पाठक

स्रोत: TIME 

ट्रम्प अपने transactional foreign policy के लिए जाने जाते हैं। धुर व्यापारी रहे ट्रम्प इसलिए ही बहुपक्षीय रिश्तों से अधिक द्विपक्षीय रिश्तों को तरजीह देते हैं। ट्रम्प का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी देश को अमेरिका का सहयोगी राष्ट्र बनने से किसी क्षेत्र विशेष में लाभ है तो उसका भार उठाने में वह देश भी स्पष्टतया आगे आये। इससे पहले एकलौते सुपरपॉवर अमेरिका की यह prioritised जिम्मेदारी होती थी। इसे सुपरपॉवर देश का ऑब्लिगेशन कह लीजिये। इसलिए ही भारत से जब-तब मांग की जाती है कि वह अफग़ानिस्तान में अपने सुरक्षा बल भी भेजे। प्रशांत क्षेत्र को इंडिया-पैसिफिक क्षेत्र कहने के पीछे अमेरिका की यही मंसा है क्योंकि यदि चीन का उभार केवल अमेरिका के लिए ही नहीं एक कंसर्न है तो भारत को भी हिन्द महासागर क्षेत्र से प्रशांत क्षेत्र तक की जिम्मेदारी उठानी होगी। ट्रम्प ने यह दबाव लगभग अपने सभी सहयोगी राष्ट्रों पर बनाया है और जापान ने इसे स्वीकारा भी है। QUAD इसी समझ की परिणति है।

कुछ इसीतरह का दबाव जब दक्षिण कोरिया पर बनाया गया तो दक्षिण कोरिया, क्षेत्र से अलग अपनी वैश्विक भूमिका को लेकर एक आर्थिक-सामरिक दबाव महसूस करने लगा। दक्षिण कोरिया ने वह किया है जो काश कि भारत और पाकिस्तान भी कभी करते। दक्षिण कोरिया ने उन सभी संभावनाओं पर काम किया जिससे उत्तर कोरिया से उसकी खटास कम हो सके और इससे महाशक्तियों की क्षेत्र में दखलंदाजी कम की जा सके। रूस, चीन उभार के प्रमुख साथी उत्तर कोरिया से ज्यों-ज्यों दक्षिण कोरिया को सकरात्मक संकेत मिलता गया, अमेरिका, उत्तर कोरिया से बातचीत को उत्सुक होता गया क्योंकि इससे रूस, चीन के प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है।

इधर चीन ने हिन्द महासागर, दक्षिण एशिया, रूस, आसियान क्षेत्रों में ज्यों-ज्यों पाँव बढ़ाता गया और ट्रम्प ने अपनी 'राष्ट्रवादी संरक्षणवादी' नीतियाँ आरोपित करनी शुरू कीं, भारत ने भी QUAD की ख़ुमारी में की गयीं अपनी अतियाँ दुरुस्त करनी शुरू की। चीन और रूस से नरम रुख अब लाज़िमी है। फिर क्षेत्र के हित, वैश्विक हितों से सदा ही ऊपर रखे जाते हैं।

शांगरी ला डायलॉग (SLD) और SCO भी नहीं छोड़ा जा सकता ताकि QUAD के 'Indo-Pacific' पर bargain की स्थिति बनी रहे, मालाबार अभ्यास भी नहीं छोड़ा जा सकता ताकि चीन-रूस से bargain किया जा सके। भारत मालाबार अभ्यास में शामिल है बस अपने हालिया चीन-रूस नरमी में विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए ऑस्ट्रलिया के इसमें प्रतिभाग करने के आग्रह को ठुकरा दिया है। सामरिक रूप से फ़िलहाल इसमें भारत को नुकसान नहीं है क्योंकि वह अमेरिका और जापान के साथ प्रतिभाग कर ही रहा है, आगे कभी अमेरिका के मित्र ऑस्ट्रेलया को साध ही लिया जायेगा।

भारत की चीन-रूस के प्रति दिखाई गयी हालिया नरमी अपना असर भी बना रही अमेरिका पर। रूस से भारत की S-400 के लिए की गयी डील एक सामरिक संबंध भी बनाएगी, इसलिए अमेरिका का इससे नाखुश होना अपेक्षित है। ट्रम्प की विदेशनीति एक सुपरपॉवर देश की विदेशनीति नहीं है। इससमय दुनिया भर के देश अमेरिका पर भरोसा कर भी रहे हैं तो उन्हें ट्रम्प के adventurism से बहुत दिक्कत है। इस सुन्दर मौके का फायदा रूस के पुतिन उठा रहे हैं। हाल ही अमेरिकापरस्त यूरोप के सबसे शक्तिशाली देश जर्मनी ने कहा है कि रूस, यूरोप का सब रीति से अभिन्न अंग है।

सलाम दक्षिण कोरिया को और उसके राष्ट्रपति मून को जिसने उत्तर कोरिया को अछूत नहीं समझा और आखिरकार उसे रूस और चीन का मोहरा बनने से बचाया. भारत-पाकिस्तान के हुक्मरान तो बस घुसाए जा रहे रूस, चीन और अमेरिका को दक्षिण एशिया में लेकिन स्वयं शांतिपथ अख्तियार नहीं कर सकते.

आर्थिक वैश्वीकरण ने वैश्विक राजनीतिक ध्रुवीकरण को पारदर्शी नहीं रहने दिया है। यों तो अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आदर्शवाद (उदारवाद) और यथार्थवाद सर्वथा अलग-अलग विचारधाराएँ हैं जो वैश्विक हलचलों को समझने में मदद करती हैं, पर आपका-हमारा यह समय संभवतः वैश्विक राजनीति के 'उदारवादी यथार्थवाद' की विचारधारा का है जिसमें 'वैश्वीकरण' ने जहाँ 'जटिल-अंतर्संबद्धता (Complex Interconnectedness)' पैदा की है वहीं 'राष्टहित के लिए शक्त्ति' के संचयन के तर्क से 'राष्ट्रीय संरक्षणवाद' को भी उकसाया है। ऐसे vulnerable समय में भारत जैसे देश किसी 'स्पष्ट' पथ पर चलना afford नहीं कर सकते। Diplomacy यों भी वाह्यरूप में जितनी ambiguous होती है, उतनी ही प्रभावी मानी जाती है।

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