मोदी सरकार के चार वर्ष: कैसी रही विदेश नीति? - डॉ. श्रीश पाठक



साभार:इंडिया टुडे 
"लोग उतना झूठ कभी नहीं बोलते जितना कि शिकार के बाद, युद्ध के दरम्यान और चुनाव के पहले बोलते हैं। " - ऑटो वॉन बिस्मार्क 

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के विदेश नीति का आधार, झुकाव और कार्यशैली कमोबेश एक-सी रही। उसमें ‘परिवर्तन और सततता’ का गुण विद्यमान था। अवसर अनुकूल जोखिम लिए गए और मूलभूत मुद्दों पर दृढ़ता बनी रही। दोनों सरकारों ने अपने क्षेत्र के पड़ोसियों से संबंध बनाये रखने का महत्त्व समझा था और विश्व-राजनीति में एक स्पष्ट रुख रखते हुए जहाँ-तहाँ संबंधों को बनाने की दिशा में प्रयासरत रहे। विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव अमेरिका बना हुआ था और उसके सबप्राइम क्राइसिस से दुनिया उबरी ही थी। भारत के संबंध अमेरिका से क्रमशः प्रगाढ़ हो रहे थे और रूस से संबंध सततता में थे। पर्यावरण, खाद्य-सुरक्षा और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारतीय रुख स्पष्ट था और लोकतांत्रिक समानता पर आधारित था। भारत के पड़ोस में परेशानियाँ थीं फिर भी दक्षेस की बैठकें जारी थीं।

भारत में जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बहुमत से चुनी गयी थी उस समय दुनिया में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा दाएश (आईएस), पश्चिम एशिया में अपनी जड़ें जमा रहा था, रूस यूक्रेन मुद्दे से अपने को कोकून से निकाल रहा था, चीन, दक्षिणी चीन सागर पर अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहा था, यूरोपीय यूनियन ग्रीस संकट से निपट रहा था और अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर अपनी कमजोरियाँ दुरुस्त कर रहा था। अटल-मनमोहन से इतर मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला जो विदेश नीति संचलन दृष्टि से आदर्श स्थित्ति थी। मोदी सरकार ने विदेश मंत्री के पद पर अनुभवी, तेजतर्रार सुषमा स्वराज को, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर दृढ़ मिज़ाज अजीत डोवाल को और विदेश सचिव एस. जयशंकर को चुनकर अपने इरादे और प्राथमिकता स्पष्ट कर दी।

 अब जबकि यह उपयुक्त समय है कि मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का सम्यक आकलन किया जाय, यह उचित होगा कि इन चार सालों में विश्व-राजनीति में हुए बदलावों पर भी चर्चा हो क्योंकि विदेश नीति, विश्व-राजनीति के सापेक्ष ही गढ़ी जाती है। नब्बे के दशक से यों लगने लगा था कि अमेरिका ही विश्व-राजनीति का एकल ध्रुव है किन्तु नयी सहस्राब्दि के पहले दशक के गुजरते-गुजरते विश्व-राजनीति बहुध्रुवीय प्रकृति की दिखने लगी। अमेरिका के अलावे, चीन, जापान, ईयू (जर्मनी, फ़्रांस, आदि ), रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब, आसियान आदि दूसरे ध्रुव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उभरने लगे और विश्व द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के तौर-तरीकों से चलता दिखा। दुनिया के देश हार्ड पॉवर (सैन्य, अर्थ, गणनीय क्षमता) बनने के साथ-साथ सॉफ्ट पॉवर (सांस्कृतिक, अगणनीय क्षमता) बनने की दिशा में भी कार्यशील हुए। विश्व-राजनीति में एशिया का महत्त्व सर्वाधिक बढ़ा और विकसित सभी देश अपने एशियाई पार्टनरों को पुचकारने लगे। लेकिन वैश्विक आतंकवाद, आणविक विकास स्पर्धा  और विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण ने एकबार फिर दुनिया को कुछ-कुछ शीतयुद्ध सदृश गुटबाज़ी में मशगूल कर दिया। पिछले चार सालों में विश्व में दो गुट फिर से दिखने लगे हैं जिसे चतुष्क और प्रतिचतुष्क कहा जा रहा है। चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिचतुष्क के जवाब में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत का चतुष्क कार्यरत हो गया। विश्व-राजनीति में ऐसे नेता उभर रहे हैं जो अपनी घरेलू राजनीति में लगभग अपराजेय रहते हुए अपने देश की अपराजेयता के स्वप्न पाल बैठे हैं। रूस के पुतिन, जापान के शिंजो अबे, चीन के शी जिनपिंग, जर्मनी की एंजेला मोर्केल, आदि सभी नेता आज की विश्व-राजनीति में बेहद निर्णायक हैं। इन दोनों गुटों में चीन सबसे आक्रामक दिखाई पड़ता है और गुटनिरपेक्ष राजनीति करने वाला भारत अमेरिका से बने नए द्विपक्षीय समझ के तहत एक गुट में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। रूस, कूटनीतिक इतिहास में पहली बार पाकिस्तान को हथियार भेज रहा है और पाकिस्तान, चीन के साथ एक गुट में है। हिन्द महासागर और प्रशांत में बढ़ती चीन की दखलंदाजी को देखते हुए अमेरिका ने भारत की भूमिका बढ़ाने की गरज से इस समूचे क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक रीज़न (हिन्द-प्रशांत क्षेत्र )’ कहना शुरू किया है।

मोदीयुगीन ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’

‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ इस शब्द-युग्म की बड़ी चर्चा थी जब उम्मीदों की मोदी सरकार ने शपथ लिया था। मोदी, व्यक्तिगत रूप से विदेश नीति में बेहद रूचि लेते रहे और उन्होंने विदेश यात्राओं की झड़ी लगा दी। इस लेख के लिखे जाने तक मोदी 36 विदेश यात्रायें कर चुके हैं जिसमें कुल 56 देशों की ज़मीन पर मोदी पांव रख चुके हैं। इनमें से कई ऐसे देश हैं जहाँ काफी समय से कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुँचा ही नहीं। विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए भी यह एक ‘जुड़ाव’ का मौका होता है और इस तरह की यात्रायें निश्चित तौर पर देश को सॉफ्ट पॉवर के रूप में भी स्थापित होने का मौका देती हैं। बहुत सारे देशों में द्विपक्षीय वार्ताएं जो ठिठकी पडी थीं, वह पुनः शुरू हुई हैं।

अफ्रीका महाद्वीप से संबंध हमारे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी देते हैं। मनमोहन सिंह के समय से शुरू हुई हर तीन साल पर होने वाली ‘इंडिया-अफ्रीका समिट’ को मोदी ने 2015 में बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया। जुलाई, 2016 में मोदी ने अपनी अफ्रीका यात्रा में मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंज़ानिया, केन्या आदि देशों की यात्रा की और जापान के साथ मिलकर ‘अफ्रीका विकास बैंक’ के संदर्भ में गुजरात के गांधी नगर में बैठक करते हुए ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर’ पर काम शुरू किया। दक्षिण चीन सागर विवाद और आसियान, जापान, उभरते चीन, फिर से होड़ में आने को बेताब रूस आदि की वज़ह से पूर्व एशिया व प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती सामरिक महत्ता ने भारत को विवश किया कि वह हिलेरी क्लिंटन की सुझाई ‘ऐक्ट ईस्ट’ शब्दावली को अपनाये और इधर अपनी सक्रियता बढ़ाये। मोदी ने अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत म्यांमार और थाईलैंड को अपना स्तम्भ बनाया और इनसे द्विपक्षीय संबंधों पर श्रम किया। कनेक्टिविटी, कॉमर्स और कल्चर के नारे के साथ मोदी उस सामरिक हिचक से बाहर आये जिसमें भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के रणनीतिक जगहों का अवसरंचना विकास जानबूझकर नहीं किया जाता था ताकि कोई अन्य देश इसका फायदा न उठा ले। मई, 2017 में आसाम में मोदी ने एक सड़क पुल का उद्घाटन किया और ‘भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे परियोजना’ में निवेश किया। जापान और आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में भारत के विश्वसनीय साझेदार बनकर उभरे हैं। जापान ने जहाँ  भारत से आणविक संधि संपन्न की वहीं उसने ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘दिल्ली-मुंबई इन्डस्ट्रीअल कॉरिडोर’ परियोजना में निवेश किया है। मोदी ने, आस्ट्रेलिया, जापान, फ़ीजी, मंगोलिया समेत सभी आसियान देशों की यात्रा की और इस वर्ष 26 जनवरी की परेड में सभी आसियान देशों के प्रतिनिधि उनके निमंत्रण पर भारत भी आये। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की औचक अमेरिका-पैसिफिक हेडक़्वार्टर कैंप स्मिथ की यात्रा बताती है कि दक्षिणी चीन सागर की सुरक्षा को लेकर भारत, अमेरिका प्रतिबद्ध हैं।

2017 में मोदी ने यूरोपीय देशों यथा- जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और रूस की यात्रा की और ईयू के सर्वाधिक प्रभावशाली देश जर्मनी से अपनी साझेदारी बेहतर की। भारत और फ़्रांस अपने सामरिक संबंधों को लेकर बेहद गंभीर हैं और नवनिर्मित सामरिक गुट चतुष्क में भी अपनी सहभागिता की मंशा जतलाई है। भारत में दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक समुदाय मुसलमानों का है, इसलिए भारत और मध्य-पूर्व दोनों ही पारस्परिक संबंधों का महत्त्व समझते हैं। भारत के व्यापारिक अन्तर्क्रियाओं के लिए अरब सागर की सुरक्षा और लाल सागर में प्रवेश की सुविधा भी अहम् मुद्दे हैं। मोदी ने अपनी संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल, फलस्तीन, ओमान, क़तर, जॉर्डन की यात्राओं से अपनी ‘लिंक वेस्ट पॉलिसी’ को ‘थिंक वेस्ट पॉलिसी’ में परिणत कर दिया और इज़रायल व फलस्तीन दोनों से संबंधों का संतुलन बनाने की कोशिश की। मोदी सरकार की तारीफ करनी होगी जब अमेरिका के येरूशलम राजधानी घोषणा करने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अरब समुदाय के पक्ष में मत दिया और इराक, यमन आदि देशों में फँसे भारतीयों को निकालने में तत्परता दिखाई।

नेबरहुड फर्स्ट से नेबरहुड लॉस्ट 

मध्य एशिया में जहाँ गैसीय ऊर्जा के भंडार क्षेत्र हैं, एक अरसे से वहाँ रूस का दबदबा है और रूस की सहायता से ही चीन की पकड़ बन रही है; मोदी ने काँग्रेसी पूर्व मंत्री ई. अहमद की शब्दावली उधार ली और अपनी सक्रियता ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी’ के नारे के साथ जुलाई 2015 में क्षेत्र के पांच देशों की यात्रा की। चीन-पाकिस्तान आर्थिक सहयोग गलियारा जो भारत का  मध्य एशिया से संपर्क समाप्त कर देता है उसका जवाब मोदी सरकार ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर तुर्कमेनिस्तान और कजाखस्तान रेलवे परियोजना का लाभ लेते हुए पुनः संपर्क स्थापित करके दिया। प्रधानमंत्री बनते ही मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता दिया और वे सम्मिलित भी हुए। दक्षिण एशिया में भी मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ ‘लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट’ कर ‘एन्क्लेव्स’ मुद्दे को समाप्त किया। नेपाल में भूकंप आने पर यथासंभव मदद दी। प्रधानमंत्री बनते ही पहली यात्रा के तौर पर भूटान को चुना डोकलाम मुद्दे पर डटे भी रहे। अलग-अलग समयों में मोदी की गयी अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, ब्राज़ील की यात्रा बताती है कि उनके लक्ष्य में अमेरिकी महाद्वीप भी शामिल हैं। मोदी सरकार की अन्य उपलब्धियों में निश्चित ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस हेग में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार समितियों में से एमटीसीआर, डब्ल्यू ए और ऑस्ट्रेलिया समूह सहित तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फाँसी पर रोक, कई देशों से आणविक समझौते करना, एफटीए हस्ताक्षर करना, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन विरुद्ध और मारीशस के पक्ष में मतदान करना आदि अवश्य शामिल किये जाने चाहिए।

मोदी सरकार की शुरुआत तो बड़े जोरशोर से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ के नारे से हुई थी पर मोदी सबसे अधिक विफल कहीं हैं तो अपने इर्द-गिर्द पड़ोस में हैं। विश्व-राजनीति का अध्ययन कहता है कि बिना अपने आस-पड़ोस को सम्हाले कोई राष्ट्र, विश्व-राजनीति में कहीं टिक ही नहीं सकता। इस ‘नेबरहुड लॉस्ट’ से मोदी की सारी ‘एक्टिव फॉरेन पॉलिसी’ की कवायद यकीनन धरी की धरी रह जाएगी।  अपने पड़ोस में चीन सहित दक्षिण एशियाई सभी पड़ोसी देशों से आर्थिक साझेदारी वहीँ धीमी गति से चल रहे हैं और कूटनीतिक संबंध खिंचे हुए हैं। चीन ने अपनी ‘ओबोर नीति’ के तहत भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों से अवसंरचना विकास के नाम पर भारी निवेश किया है और हालिया डोकलम विवाद से भी एक दबाव बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान से संबंध कभी सामान्य हुए ही नहीं और मोदी सरकार ने कोई रचनात्मक शुरुआत भी नहीं की। कुछ विश्लेषकों की राय में चीन का एक आर्थिक-सांस्कृतिक असर अवश्य भूटान पर भी पड़ने लगा है और 2018 के देश के तीसरे आम चुनाव में नेपाल के हालिया चुनाव की तरह ही यहाँ भी भारत-विरोधी भावनाओं का उभार दिख सकता है । हाल के रोहिंग्या संकट पर भारत का कमोबेश ठंडा रवैया बांग्लादेश को ठीक तो नहीं ही लगा है। नेपाल के नए संविधान की घोषणा के तुरंत बाद ही असंतुष्ट मधेसियों के द्वारा रक्सौल-बीरगंज पॉइंट नाकाबंदी पर भारत का शांत रह जाना जहाँ वाम दलों और आम नेपालियों को खला है और अब वामपंथियों के सत्ता में आने से और उनकी चीन की तरफ तथाकथित झुकाव से भी भारत-नेपाल संबंध नाजुक तो हुए ही हैं, यह नेपाली प्रधानमंत्री की यात्रा में भी महसूस किया गया । हाल-फ़िलहाल भारत के श्रीलंका से संबंध भी खास चर्चा में नहीं हैं और श्रीलंका ने अभी अपने एक प्रमुख बंदरगाह का स्वामित्व चीन को एक समयसीमा के लिए के लिए सौपा है। चीन ने दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में अंडरवाटर सर्वेलियांस नेटवर्क्स बिछाकर यकीनन जहाँ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। मालदीव विवाद में भी भारत की अनदेखी की गयी और बिसात पर चालें चीन चलता रहा। एक चिंता की बात यह भी है कि इधर भारत के पड़ोस में अलग अलग कारणों से भारत विरोधी भावनाओं  में इज़ाफा हुआ है। पाकिस्तान के बाद, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में यह देखा जा सकता है। कुछ कारण ऐतिहासिक हैं तो कुछ सम-सामयिक हैं। चीन इस स्थिति का अक्सर यह कहते हुए लाभ उठाता है कि उसका दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध बराबरी पर आधारित हैं।

बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क 

मोदी, सरदार वल्लभ भाई पटेल को आदर्श मानते हैं, जिनके लिए प्रशा के शक्तिशाली चांसलर बिस्मार्क का नाम प्रयुक्त होता है। शुरू में ऐसा  लगा कि बिलकुल बिस्मार्क की तरह मोदी हर स्टीरियोटाइप तोड़ देंगे और भारत का राष्ट्रहित साधने के लिए कोई भी जोखिम लेंगे। मोदी का शपथग्रहण, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान में जाकर सहसा बिरयानी खाना, इज़रायल की यात्रा, वेनेजुएला का गुटनिरपेक्ष सम्मेलन जानबूझकर छोड़ना, सार्क सम्मेलन में दिलचस्पी न लेना, फलस्तीन-जॉर्डन की यात्रा, भारत के संयुक्त राष्ट्र में किये गए मत आदि ढेरों अवसरों पर मोदी विश्लेषकों को चौंकाते रहे पर इतनी उछलकूद का जब हासिल खोजा जाए तो ठोस उपलब्धियाँ नदारद मिलती हैं। रूस की पारंपरिक दोस्ती  मोदी को छोड़ कोई भी भारतीय सरकार नहीं गंवाना चाहेगी। सार्क को पुनर्जीवित करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। मालदीव में जब अमेरिका सहित समूचा पश्चिम भारत की ओर देख रहा था, मोदी मौन रहे। ईरान ने चाबहार पर व्यापार करने के लिए पाकिस्तान को भी न्यौता दे दिया है। पास के ग्वादर बंदरगाह पर पहले ही चीन और पाकिस्तान काबिज हैं। भारत, येरुशलम मुद्दे पर मध्यस्थता कर सकने की पहल कर सकता था पर चीन पहले ही अरब-इजरायल संवाद का आयोजक है। मोदी उम्मीद तो बिस्मार्क की तरह जगाते रहे और उनके अधिकारी चीन की नाराजगी के भय से दलाई लामा का ‘थैंक यू इंडिया’ कार्यक्रम तक स्थगित करा दिया।

मोदी की विदेश नीति में दरअसल एक विजन और तारतम्यता का अभाव दिखा। प्लान बी की झलक कहीं नहीं मिली। विदेश नीति के हलचलों को भी चुनावों में पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग के लिए पहली बार बेशर्मी से प्रयोग किया गया। इराक़ में चालीस मजदूरों की मौत महज इसलिए छिपाई गयी कि यह पॉजिटिव परसेप्शन बिल्डिंग बर्बाद न हो जाये। विदेश नीति के क्षेत्र की उपलब्धियाँ और नाक़ामियाँ दोनों ही दूरगामी प्रभावों वाली होती हैं। सफलता, दूसरी कई सफलताओं के रास्ते खोलती है वहीं असफलताएँ आसानी से रफू नहीं होतीं क्यूँकि विश्व-राजनीति के अधिकांश कारक बाहरी होते हैं। मोदी सामरिक चतुष्क के सदस्य बनकर भी न मालदीव, न अफ़ग़ानिस्तान और न प्रशांत क्षेत्र में कोई रचनात्मक हस्तक्षेप करते हैं और न ही चीन, रूस, पाकिस्तान से संबंध सुधारकर दक्षिण कोरिया-उत्तर कोरिया की तरह महाशक्तियों की क्षेत्र में दखलंदाजी रोकने की कवायद करते हैं। मोदी विदेश नीति को संचालित करने वाली उस स्थाई नौकरशाही में भी कोई संरचनात्मक सुधार नहीं करते जो अभी भी कितने ही पर्सेप्शन्स में उन्हीं पुराने तरीकों से काम करती है, जिससे किसी नवीन दृष्टिकोण की उम्मीद नहीं की जा सकती। मोदी, विश्व और अपने पड़ोस के लिए अमेरिका, चीन, रूस, जापान की तर्ज पर कोई आर्थिक सहायता मॉडल भी नहीं बनाते जिससे राष्ट्रों को आर्थिक सहयोग तंत्र से जोड़ा जा सके। यों तो मोदी कार्यकाल के लगभग दस महीने शेष हैं पर इसमें अधिक से अधिक अपनी नीतियों का फॉलो-अप ही यदि ले सकें तो भारतीय विदेश नीति को लाभ होगा। क्योंकि विश्व भर की यात्राओं का जितना हासिल है भी वह भी यह सरकार इसलिए खोती  नज़र आ रही है क्योंकि फॉलो-अप उचित रीति से नहीं किये जा रहे । कहना होगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मोदी को स्पष्ट बहुमत, खुला अमेरिकी समर्थन और चतुष्क की सदस्यता का जो सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ था, वह अवसर वह लगभग गँवा चुके हैं बल्कि आने वाली सरकारों को एक बार फिर से रूस सहित एशिया के बाकी देशों से संबंध दुरुस्त करने में नाको चने चबाने होंगे। भारत को निश्चित ही अपनी विदेश नीति के लिए एक बिस्मार्क सरीखा शक्तिशाली राजनीतिक नेतृत्व नसीब हुआ तो था पर वह अमूमन बस डोलता बस बोलता बिस्मार्क साबित हुआ। वैसे बिस्मार्क ने यह भी कहा था :

“राजनीति अगले बेहतरीन को पाने की कला है !”

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