नार्थ ईस्ट स्टेट्स और नॉन ट्रैडीशनल थ्रेट्स की पॉलिटिक्स- डॉ. श्रीश पाठक

साभार: गूगल 

पिछले दो दशक में केंद्र सरकार के प्रयासों और देश में सूचना क्रांति की दस्तक ने पूर्वोत्तर क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विशिष्टताओं का परिचय देश की मुख्यधारा से करवाया है। अपना देश लोकतंत्र के सबसे प्रसिद्घ मंदिरों में है और चुनाव इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। आम तौर पर देश के पूर्व-उत्तर क्षेत्र में होने वाले विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय मीडिया और जन-सामान्य का ध्यान आकर्षित नहीं करते किंतु हालिया संपन्न हुए नागालैंड, मेघालय और त्रिपुरा के चुनावों ने जमकर सुर्खियाँ बटोरीं। इसका एक मुख्य कारण यह अवश्य है कि कांग्रेस के बाद भाजपा वह दूसरा राष्ट्रीय दल है जिसकी सक्रियता पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ी है, इसकी पुष्टि चुनाव परिणाम भी करते हैं। इन चुनावों के मध्य एक मुद्दा ऐसा भी उभरा जो आंतरिक सुरक्षा से संबंधित था और जिसके तार अंतरराष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़ते हैं। एक सेमिनार में बोलते हुए सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने जब पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे गैर-कानूनी प्रवसन (माइग्रेशन) की चर्चा उठाई तो वह कोई नए मुद्दे पर बात नहीं कर रहे थे किंतु वह इस पुराने मुद्दे पर नए तरीके से अवश्य बात कर रहे थे। जनरल रावत का कहना था कि इन राज्यों में प्रवसन दरअसल हमारे पूर्वी और पश्चिमी पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) के द्वारा उनके नियोजित छद्म युद्ध रणनीति के तहत कराया जा रहा है। उन्होंने एक विवादित बयान भी दिया कि असम की एआईयूडीएफ पार्टी की प्रगति भाजपा से भी अधिक तीव्र  है। 

देश में एक विमर्श उमड़ पड़ा। आख़िरकार यह एक महत्वपूर्ण पद पर आसीन व्यक्ति के हवाले से दो पड़ोसी देशों पर सीधा आरोप लगाने का मुद्दा था। इन दोनों ही देशों से भारत के संबंध सहज नहीं हैं। पाकिस्तान से पिछले कई सालों से पारंपरिक वार्ता भी स्थगित है और डोकलम, मालदीव और दलाई लामा प्रकरणों पर चीन से गर्मागर्मी बनी ही हुई है। इस बयान से विमर्श के तीन कोण उभरते हैं; पहला, क्या लोकतांत्रिक देश में पदासीन सेनाध्यक्ष का संवेदनशील मुद्दों पर यों बयान देना उचित है? दूसरा, एआईयूडीएफ और भाजपा की तुलना क्या एक राजनीतिपरक बयान नहीं है? और तीसरा, इन बयानों में कितनी सच्चाई है ?

लोकतंत्र और सेना 
लोकतंत्र में लोक सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जिसका प्रतिनिधित्व संसद करती है। लोकतांत्रिक शासनों का सबसे उम्दा पहलू है-सैन्य तंत्र का दैनिक राज-काज में अहस्तक्षेप। यह किसी भी राष्ट्र के लोकतंत्र की एक कसौटी समझी जाती है कि वहाँ शक्ति-पृथक्करण के सिद्धांत से सरकार के सभी अंग अपनी-अपनी मर्यादा में व्यवहार कर रहे हैं अथवा नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध तो आम नागरिकों के लिए भी है, किंतु सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों की अभिव्यक्ति और भी संवेदनशील हो जाती है क्योंकि बहुधा इसे ‘राज्य का औपचारिक मत’ माना जाता है और इसके दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं। वांछित स्थिति यही मानी जाती है कि सेना से जुड़े लोग कोई भी ऐसा बयान न दें जिससे देश की सुरक्षा स्थितियों पर कोई भी प्रभाव पड़े। ऐसे में जनरल रावत के बयानों की तथ्यता यदि प्रश्नगत न भी हो, तो भी देश के दो पड़ोसियों पर सहसा प्रत्यक्ष आरोप लगाना कहीं से भी बुद्धिसम्मत नहीं है। फिर यह आरोप यदि सेनाध्यक्ष की ओर से आये तो इसके रक्षा निहितार्थ भी निकलते हैं, यह ध्यान दिया जाना चाहिए। डोकलम, मालदीव मुद्दे के बाद सरकार ने शासन के अधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं को तिब्बत निर्वासित दलाई लामा के भारत में साठ साल पूरे होने के कार्यक्रम में भाग न लेने के निर्देश दिए और आख़िरकार यह कार्यक्रम स्थगित भी करना पड़ा। स्पष्ट है कि भारत कहीं से भी चीन से सीधी टकराहट मोल नहीं लेना चाहता, इसलिए यह आशंका निर्मूल नहीं है कि सेनाध्यक्ष स्तर से आये बयानों का प्रयोग कर इस संवेदनशील मुद्दे की जटिलता बढ़ायी जा सकती है। कूटनीति की एक परिष्कृत भाषा होती है। पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे गैर-कानूनी प्रवसन में यदि भारत का चीन और पाकिस्तान के भूमिका की आलोचना करना उसकी किसी कूटनीतिक आयाम का भाग था तो विदेश मंत्री अथवा विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से परिष्कृत रूप में बयान जारी किया जा सकता था। 

सेना प्रमुख और राजनीतिक बयान 
फिर उनका दूसरा बयान विशुद्ध रूप से राजनीतिक बयान था जिसमें वह असम के एआईयूडीएफ पार्टी की तुलना भाजपा से करते हैं। उनके बयान के निहितार्थ यह है कि- सीमा पार से एक बड़ी संख्या में पाकिस्तान-चीन प्रायोजित मुस्लिम प्रवसन हो रहा है, वे धीरे-धीरे पूर्वोत्तर राज्यों की जनंकिकी (डेमोग्राफी) प्रभावित कर रहे हैं और एआईयूडीएफ जैसी पार्टी को समर्थन कर वे पार्टी और अपना राजनीतिक महत्व बढ़ा रहे हैं। अभी यदि इस कथन की सत्यता पर न भी बात करें तो यह बयान बड़ी आसानी से भाजपा और एआईयूडीएफ, दोनों ही दलों के विकास को एक सांप्रदायिक कारक प्रदान कर देता है। इस बयान के लिए जो समय चुना गया वह निश्चित ही एक तरह के राजनीतिक ध्रुवीकरण को उकसाता है। राजनीतिक हलकों में इस बयान को शंका की दृष्टि से देखा गया और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सेना प्रमुखों के सेवानिवृत्ति के पांच साल तक चुनावों में परिभाग करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की। 

पूर्वोत्तर राज्यों के संदर्भ में यदि पिछले तीन दशकों में संपन्न हुए जनगणना के आँकड़ों को ध्यान से देखें तो सात राज्यों की जनसंख्या वृद्धि का एक-जैसा पैटर्न नहीं मिलेगा। अलग-अलग राज्यों की जनंकिकी पर  अलग-अलग समयों में अलग-अलग कारक दिखाई पड़ेंगे। जनसंख्या के आँकड़ों को देखते समय पूर्वोत्तर राज्यों का इतिहास भी दृष्टि में रखें तो कोई भी तथ्य उतना चौंका नहीं लगता, जैसा कि कई प्रायोजित विश्लेषणों में दिखने लग जाता है। यह निर्विवादित तथ्य है कि सीमापार से -कानूनी प्रवसन होता है,  इससे जनंकिकी तनाव भी उभरते हैं और इस गैर-कानूनी प्रवसन में चीन और पाकिस्तान की अप्रत्यक्ष भूमिका से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता; किंतु इसमें सरकारी मशीनरी की असफलता अधिक दिखती है। फिर गैर-कानूनी प्रवसन का गैर-कानूनी होना ही यह आवश्यक बना देता है कि इस तरफ गंभीरता से योजना बनाकर प्रभावी रूप से इसे रोकने की बहुआयामी कार्ययोजना पर काम किया जाए। इसमें सांप्रदायिक कोण रेखांकित कर समुदायों में पारस्परिक अविश्वास बढ़ाने की बजाय स्थानीय एवं राष्ट्रीय प्रतिमानों को ध्यान में रखते हुए विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में प्रगति की जानी चाहिए। आतंकवाद की कोई भी विषबेलि धरातल पर किये गए समुचित विकास के प्रयत्नों का मुकाबला नहीं कर सकती, विश्व के तमाम उदाहरण इसकी पुष्टि करते हैं। यह एक धीमी प्रक्रिया है और कोई भी गैर-ज़िम्मेदाराना बयान इस प्रक्रिया पर एक असर डाल सकता है। 

गैरकानूनी प्रवसन (Illegal Migration) एवं गैर-पारम्परिक सुरक्षा भय (Non Traditional Security Threats)
हाल-फ़िलहाल ‘सुरक्षा विमर्श’ काफी व्यापक हो चला है। पारंपरिक अर्थों की सुरक्षा में जहाँ सेना, शस्त्र, सीमा-रक्षा जैसे विषय प्रधानता में होते हैं वहीं अब ‘आधुनिक सुरक्षा विमर्श’ में शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थ, खाद्य, चिकित्सा जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जिनकी समुचित व्यवस्था न होने की स्थिति में ‘मानव-संसाधन’ पर सीधा असर पड़ता है। आधुनिक समय में कोई भी राष्ट्र अपने समुचित रक्षा-तैयारियों के लिए स्वयं ही कुछ भय (थ्रेट्स) अनुभूत करता है और उसी के अनुरूप अपनी तत्परता (प्रिपेयर्डनेस) गढ़ता है। यह तत्परता ही राष्ट्र को समकालीन और भावी रक्षा भयों से बचाता है। पारंपरिक एवं गैर-पारंपरिक दो प्रकार के भय वर्गीकृत किये जाते हैं। कब्ज़ा करना, आक्रमण करना, हताहत करना, लूटमार करना, आदि पारंपरिक भयों में आते हैं जिनसे निपटने के लिए पारंपरिक साधन और रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। जाली करेंसी, सीमा-घुसपैठ, आतंकवाद, अवैध व्यापार, महिला-बच्चों एवं नशीली दवाओं की तस्करी, विषाणु आक्रमण, स्लीपर सेल, आदि; भय के प्रकार गैर-पारंपरिक वर्ग में सम्मिलित किये जाते हैं। ‘विश्व-राजनीति के वैश्वीकरण’ वाले युग में जबकि आर्थिक संक्रियाएँ अधिक महत्वपूर्ण हो चली हैं, समूचे विश्व के सुरक्षा विश्लेषकों में सहमति है कि वर्तमान में तुलनात्मक रूप से गैर-पारंपरिक भय अधिक महत्वपूर्ण हो चले हैं। 

जैसे राष्ट्रीय राजनीति में एक संप्रभु नियामक शक्ति होती है वैसे ही विश्व-राजनीति में कोई नियामक शक्ति नहीं पायी जाती और राष्ट्रों को अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होती है। इसलिए ही भय की परिकल्पना की जाती है ताकि समुचित तैयारी की जा सके और तत्पर रहा जा सके। भय की अवधारणा बदतर की कल्पना करती है बेहतरीन की आशा करती है, तैयारियाँ समानांतर चलती रहती हैं ताकि सुरक्षा से कभी समझौता न हो। विश्व-राजनीति में नैतिकता का अर्थ केवल ‘राष्ट्रहित की सिद्धि’ होती है। राष्ट्रहित की सिद्धि के लिए राष्ट्र-राज्य सभी प्रकार की नीतियाँ अपनाते हैं। इसलिए ही भय की अवधारणा पर काम कर राष्ट्र-राज्य अपनी सुरक्षा चौकस रखते हैं। इस दृष्टिकोण से ‘गैर-कानूनी प्रवसन’ एक गैर-पारंपरिक प्रकार का भय है कि बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों से घिरे भारत की सुरक्षा के लिए देश के सुरक्षा नीतिकार व संचालक निश्चित ही ‘गैर-कानूनी प्रवसन’ के भय को समझते हुए तदनुरूप तैयारियों के लिए प्रयत्नशील होंगे। यदि किसी वजह से हम इस गैर-कानूनी प्रवसन को रोक पाने में उतने सफल नहीं रहे हैं तो पुनरीक्षण की बजाय गैर-जरूरी बयानों के माध्यम से प्रत्यक्ष दोषारोपण कर क्या हासिल होगा ? इस गंभीर मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा के इन समस्त आयामों से परिचित सेनाध्यक्ष को अपनी असमय राजनीतिक बयानबाजी से बचना चाहिये था ।  

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