हाफिज़ सईद पर नकेल? -डॉ.आशीष शुक्ल


पाकिस्तान में स्थित और विभिन्न रूपों में सक्रिय लश्कर-ए-तैय्यबा, जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन कहने को तो तीन अलग-अलग संगठन हैं, लेकिन इसके केंद्र में एक विध्वंसकारी विचारधारा तथा उसे मूर्त रूप देने में लगे कुछ शक्तिशाली एवं अतिवादी व्यक्ति हैं| यह कोई संयोग नहीं है कि वर्ष 2008 में भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों का मुख्य मास्टरमाइंड हाफिज़ सईद इन तीनों संस्थाओं का प्रमुख रहा है| संयुक्तराष्ट्र संघ और अमेरिका पहले ही उसे और उसके संगठन को प्रतिबंधित कर चुके हैं तथा अमेरिका ने तो उसके सर पर 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर का इनाम भी रखा है| दक्षिण एशिया समेत विश्व समुदाय के लिए हाफिज़ सईद की पहचान आतंकवाद की एक खतरनाक और ताकतवर संस्था के रूप में की जाती है जिसका प्रमुख उद्देश्य भारत में अशांति फैलाना है| जहाँ तक पाकिस्तान और उसकी सेना का प्रश्न है, वह इसे एक रणनीतिक परिसंपत्ति एवं विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण अस्त्र के रूप में देखती है जिसका उपयोग दक्षिण एशिया में अपने हितों की पूर्ति और संवर्धन के  लिए जरुरी समझा जाता है| यही वजह है कि पाकिस्तान और उसकी सेना दस मिलियन डॉलर के इनामी और कुख्यात वैश्विक आतंकवादी का हमेशा बचाव करते रहे हैं| 

गौरतलब है कि आतंकवाद के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही करने को लेकर लगातार बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव और अमेरिका के तल्ख़ होते रवैय्ये के बीच पाकिस्तानी राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने पिछली 9 फरवरी को एक विशेष अध्यादेश के माध्यम से आतंकवाद-विरोधी कानून—1997 में गुपचुप तरीके से एक बड़ा संशोधन कर दिया| राष्ट्रपति ममनून द्वारा जारी अध्यादेश ने आतंकवाद-विरोधी कानून—1997 की धारा 11-बी. और  11-ई.ई. में संशोधन करते हुए एक उपधारा “ए.ए.” जोड़ दी है जो यह सुनिश्चित करती है कि संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिबंधित आतंकी (व्यक्ति) और आतंकवादी संगठनों को पाकिस्तान में भी प्रतिबंधित सूची में रखा जा सके| इसका सीधा तात्पर्य यह है कि हाफिज़ सईद जैसे लोग और जमात-उद-दावा तथा फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन जैसी संस्थाएं अब पाकिस्तान के आतंकवाद-विरोधी कानून की सीधी जद में होंगी और उन्हें आसानी से प्रतिबंधित किया जा सकेगा| इसका तात्पर्य यह भी है कि पाकिस्तान की लचर कानून व्यवस्था और अपेक्षाकृत कमजोर न्यायपालिका ऐसे व्यक्तियों और संगठनों को कोई राहत नहीं उपलब्ध करा पाएगी| 

अगले कदम के रूप में सरकार जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन से सम्बंधित सभी चल-अचल संपत्तियों को जब्त करने की तैयारी कर रही है| इन दोनों संगठनों के अंतर्गत आने वाली स्वास्थ्य से सम्बंधित संपत्ति रेड क्रीसेंट को दे दी जाएगी जबकि विद्यालय का जिम्मा राज्य सरकारें उठाएंगी| पाकिस्तान के राष्ट्रीय परिदृश्य में अचानक प्रकट होने वाले इस अध्यादेश ने कुछ नए प्रश्नों को जन्म दिया है| क्या वजह थी कि पिछली 9 फरवरी को जारी अध्यादेश को राष्ट्रीय पटल पर 13 तारीख को लाया गया? पाकिस्तान के सामने ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी कि उसे राष्ट्रीय असेम्बली और सीनेट की उपेक्षा करते हुए अध्यादेश के रास्ते पर जाना पड़ा? 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान और उसकी सेना वास्तव में इस मसले को लेकर गंभीर हैं और इस तरह के व्यक्तियों और संगठनों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करने को लेकर संजीदा हैं?  हालिया घटनाक्रम और विभिन्न अन्य कारकों के सूक्ष्म विश्लेषण से ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्व के भांति यह भी पाकिस्तान की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसे दिखावे (विंडो ड्रेसिंग) के अतिरिक्त कुछ और नहीं कहा जा सकता है|  

गौरतलब है कि अंतर-सरकारी निकाय “फायनेंशियल एक्शन टॉस्क फ़ोर्स” (ऍफ़.ए.टी.ऍफ़.), जो किसी देश द्वारा हवाला (मनीलांड्रिंग) और आतंकवाद को वित्तीय मदद रोकने के लिए किए गए उपायों की समीक्षा करती है, ने ब्यूनस आयर्स में नवम्बर 2017 में संपन्न अपनी पिछली बैठक में पाकिस्तान से लश्कर-ए-तैय्यबा और जमात-उद-दावा के खिलाफ की गयी कार्यवाहियों के अनुपालन का ब्यौरा पेरिस में 18-23 फरवरी को होने वाली अगली बैठक में देने के लिए कहा था| इसके बाद संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबन्ध समिति का एक निगरानी समूह उस अनुपालन की समीक्षा के लिए जनवरी 2018 में पाकिस्तान आया था| भारत और अमेरिका द्वारा लगातार डाले जा रहे दबाव के मद्देनजर इस बात की संभावना थी/है कि ऍफ़.ए.टी.ऍफ़. पाकिस्तान को निराशाजनक सूची (ग्रे लिस्ट) में डाल दे| पाकिस्तान इस स्थिति को टालना चाहता था/है| यही वजह है कि उसने ऍफ़.ए.टी.ऍफ़. की पेरिस में होने वाली बैठक से पहले कुछेक कदम उठाकर अपने ऊपर दबाव कम करने की दिशा में सोचना प्रारंभ किया जिसकी परिणति इस अध्यादेश के रूप में हुई| 

यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछली दो फरवरी को प्रधानमंत्री शाहिद खाक़न अब्बासी की अध्यक्षता में संपन्न हुई राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक में ऍफ़.ए.टी.ऍफ़. के अंतर्गत आने वाली अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी करने हेतु सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों की न केवल समीक्षा की थी बल्कि विभिन्न मंत्रालयों को कुछ बचे हुए जरूरी काम जल्द से जल्द निपटाने के निर्देश भी दिए थे| इस बैठक में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ, गृह मंत्री अहसन इकबाल, सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा सहित तीनों सेनाओं के अध्यक्ष और ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन जनरल जुबैर महमूद हयात भी मौजूद थे|  

इसके बाद पुनः सात फरवरी को पाकिस्तानी सेनाप्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा की अध्यक्षता में रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में कोर कमांडरों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें अमेरिका द्वारा दक्षिण एशिया के प्रति अपनाई गयी सुरक्षा सम्बन्धी नीतियों के विशेष संदर्भ में बदलते हुए भू-रणनीतिक (जियोस्ट्रेटेजिक) और सुरक्षा वातावरण पर गहन चर्चा और उसकी समीक्षा की गई| इस चर्चा के अंत में इस बात पर सहमति बनी कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों को देखते हुए क्षेत्र में शांति और स्थायित्व बनाए रखने के लिए सभी साझेदारों (स्टेकहोल्डर्स) से सहयोग किया जाएगा| पाकिस्तान में सेना की अविवाद्य ताकत और परदे के पीछे उसकी महती राजनीतिक भूमिका को देखते हुए, संभव है कि अध्यादेश लाने के मसले पर भी निर्णय लिया गया हो तथा जानबूझकर इस फैसले को आम जानकारी में न लाया गया हो| 

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब कभी भी पाकिस्तान पर हाफिज़ सईद के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, वह कोई न कोई ऐसा रास्ता निकाल लेता है जिससे कि बाहरी दुनिया को यह सन्देश दिया जा सके कि सरकार उसके विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करने के लिए तैयार है| लेकिन समय बीतने के साथ धीरे-धीरे यह बात सबको पता चलती है कि वास्तव में सरकार का उद्देश्य मामले को ठंडे बस्ते में डालना था| हाफिज़ सईद के पाकिस्तान की सेना और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आई. एस. आई. से रिश्तों को देखते हुए इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसे सरकार के इस कदम का पहले से पता हो और वह पूर्व की भांति नए नाम के साथ एक नए संगठन की नींव रखने का निश्चय कर चुका हो| 

 साभार: राष्ट्रीय सहारा १८ फरवरी , २०१८

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