G-20 और भारत (विशेष रपट ) -डॉ. शान्तेष कुमार सिंह

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समूह-२० एक बहु-सदस्यीय संगठन हैं, जिसका गठन ११९९ में हुआ था. इस संगठन की पहली बैठक जर्मनी के ही शहर बर्लिन में हुई. पहले की बैठको में सदस्य राष्ट्रों के वित्तमंत्री और राष्ट्रिय बैंक के गवर्नर ही भाग लिया करते थे. २००८ के लेहमन ब्रदर्स क्रैश के कारण उत्पन्न आर्थिक मंदी के फलस्वरूप इसकी बैठके शिखर सम्मलेन में तब्दील हो गई. इस समूह में वर्तमान में २० देश, अर्जेटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिणी कोरिया, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिणी अफ्रीका, तुर्की, इग्लैंड, अमेरिका और यूरोपीय संघ, पूर्णकालिक सदस्य हैं जो सभी बैठको में हिस्सा लेते है. इस संगठन का उद्देश्य, प्रारंभ से ही, विकसित और तेजी से बढ़ रहे विकासशील देशो को एक साथ लाना रहा हैं. इसका एक प्राथमिक उद्देश्य इन दोनों समूहों के देशो के बीच एक सामंजस्य बनाये रखने का भी हैं. इस समूह के पास विश्व का ८५% सकल घरेलु उत्पाद हैं. यह विश्व के एक तिहाई जनसँख्या का प्रतिनिधित्व भी करता हैं. भारत इस संगठन का प्राथमिक सदस्य रहा हैं. यह संगठन सिर्फ भारत के लिए ही नहीं सभी सदस्यों के सामान महत्व रखता है. 

इस समूह की १२वी बैठक जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में सम्पन्न हुई. पिछली बैठक के मुद्दों को लेकर हो यह सम्मलेन आगे बढा जिसमे डिजिटलाईजेशन, प्रवासन, रोजगार, स्वास्थ्य, अफ़्रीकी देशो से साझेदारी और महिलाओ के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहें. इस बैठक में इन मुद्दों के अलावा बहुत सारे मुद्दे ऐसे थे जिसपर विश्व जनमत का ध्यान जाना बहुत ही जरुरी था जैसे वैश्विक शांति और सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और व्यापार. इसी क्रम में  कुछ द्विपक्षीय पक्षीय मुद्दे भी इस शिखर सम्मलेन के दौरान छाये रहें जैसे युक्रेन-सीरिया का मुद्दा, रूस पर प्रतिबन्ध और अमेरिकी चुनावो के दौरान रूस की भूमिका, आदि। 

इस शिखर सम्मलेन के दौरान प्रमुखता से उठाये जाये कुछ अन्य, पर प्रमुख विषय, संरक्षणवाद, वैश्विक आर्थिक संवृद्धि, अन्तरराष्ट्रीय व्यापार और विनियमन संयुक्त राष्ट्र संघ का सतत विकास पर २०३० एजेंडा, स्वास्थ्य सुधार, आतंकवाद और उत्तरी कोरिया का मुद्दा रहा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ इस बार यूरोपीय राष्ट्रों ने एकजुट होकर अपनी बात रखी. इसका उदाहरण हमें पेरिस जलवायु सम्मलेन के दौरान देखने को मिला था जब तमाम यूरोपीय देशो ने एक सुर में अमेरिकी राष्ट्रपति के पेरिस सम्मलेन से बाहर रहने के निर्णय का आलोचना की थी। 

भारत ने इस समहू के महत्वपूर्ण सदस्य होने के कारण अपनी बात को पूरी मजबूती से रखा. इन मुद्दों में भारत के लिए कुछ मुद्दे प्राथमिक रहे. कयास लगाया जा रहा था कि भारत और चीन के राष्ट्र प्रमुखों के बीच इस सम्मेलन में मुलाकात हो सकती है जबकि दोनों ही देशो के विदेश मंत्रालयों ने इस बात को पूरी तरह नकार दिया था. ऐसे वक्त में जब दोनों देशो की सेना सिक्किम से सटे, भूटानी क्षेत्र दोकालाम, को लेकर एक दुसरे के आमने सामने खडी हैं, लग नहीं रहा था कि दोनो राष्ट्र प्रमुख द्विपक्षीय स्तर पर इस सम्मलेन के दौरान कोई बातचीत करेंगे . ऐसा नहीं था कि इनके बीच बातचीत होने की संभावना ही नही थी, सबसे बड़ी सम्भावना तो ब्रिक्स राष्ट्राध्यक्षो के बैठक के दौरान होने की थी जो पूर्व निर्धारित कार्यक्रम था, जहा दोनों प्रमुख मिलें भी और एक दुसरे की प्रशंसा भी की. 

भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने इस शिखर सम्मलेन के दौरान कुछ अन्य राष्ट्र प्रमुखों से भी द्विपक्षीय स्तर भी बातचीत किया जैसे अर्जेंटीना, कनाडा, इटली, जापान, मैक्सिको, दक्षिणी कोरिया, इंग्लैंड, और वियतनाम. भारत इन देशो के अपने द्विपक्षीय सम्बंधों को मजबूत बनाने के लिए बातचीत किया. वह इन देशो से विश्व में उभरती समस्याओ जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक असंतुलन,  व्यापारिक सम्बन्ध, संयुक्त राष्ट्र सुधार, चीन की विस्तारवादी  नीतियों पर चर्चा किया. भारत ने पूरी कोशिश की कि वो इन देशो को यह विश्वास दिलाने में सफल हो सके कि, वो एक लोकतांत्रिक और जिम्मेदार देश हैं, जो विश्व शांति  और एकता के  आदर्शो  पर चलने  वाला राष्ट्र हैं. चीन की नीतियों का, चाहे वो आर्थिक हो, सामरिक हो या फिर कोई और, वर्तमान में बहुतायत देश विरोध कर रहे हैं. कुछ अन्य प्रमुख मुद्दे जिसपर चीन को घेरने की तैयारी भारत ने अन्य देशो के साथ मिलकर किया जैसे दक्षिणी चाइना सागर का मुद्दा, आतंकवाद पर चीन की संयुक्त राष्ट्र संघ में रवैया, जापान, दक्षिणी कोरिया और वियतनाम के साथ उनके सम्बन्ध इत्यादि. इन मुद्दों पर भारत इन देशों के साथ खड़ा दिखना चाहता था जिससे ये राष्ट्र भारत के साथ भविष्य में खड़े हों जोकि  वर्तमान भारत-चीन सीमा विवाद के दौरान देखने को मिला भी।  

इस समय दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं. भारत ने इस शिखर सम्मलेन के दौरान वैश्विक आर्थिक विसंगतियों पर अपनी बात रखा. पिछले कुछ दशको से चीन, भारत और  अन्य विकासशील देश विकसित देशो के सामने खड़े होकर, अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं. ऐसे समय में भारत ने हमेशा कोशिश की कि वो विकासशील देशो के हितो के लिए उनकी आवाज़ बन सके. प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले कुछ सालों में देश की वैश्विकस्तर पर सकारात्मक छवि बनाने में बड़ी सफलता हासिल की हैं, ऐसे में इस शिखर सम्मलेन के दौरान तमाम विकासशील अर्थप्रणालियों द्वारा, सभी के हितो की सुरक्षा और संवर्धन के लिए भारत द्वारा आवाज़ उठाये जाने की उम्मीद लगाना, कोई आश्चर्य की बात नहीं थी.  भारत ने पिछलो कुछ वर्षो में विश्व व्यापार संगठन और अन्य वैश्विक संस्थाओ में विकासशील और अल्प विकसित देशो के हितो की सुरक्षा की लड़ाई लड़ी हैं और इस शिखर सम्मलेन में भी वैश्वीकरण के दुष्प्रभावो को सामने रखते हुए गरीब और विकासशील राष्ट्रों के हितो के लिए आवाज़ उठाया.

आतंकवाद ने मध्य पूर्व में पूरी तरह से तबाही मचाया हुआ है ऐसे समय में भारत ने सभी देशो के सामने ये मुद्दा रखा कि किस तरह से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से पिछले कई सालों से संघर्ष कर रहा है, जो अभी भी जारी हैं. इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक और सीरिया जैसे आतंकवादी संगठन किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं, सम्पूर्ण विश्व के खतरा है, भारत इस शिखर सम्मलेन में यह बात जोरदार ढंग से रखने में पूरी तरह से सफल रहा. भारत ने विश्व जनमत को ये भी बताया की इसकी जड़ पाकिस्तान में देखी जा सकती है. प्रधानमंत्री मोदी नें स्पष्ट शब्दों में कहा कि पिछले कुछ सालों में पकिस्तान ने जिस तरह से आतंकवाद को आर्थिक, सामरिक और सांगठनिक सहयोग प्रदान किया है उससे वैश्विक स्तर पर चल रही आतंकविरोधी लड़ाई कमजोर हुई है . उन्होंने कहा की विश्व के तमाम राष्ट्रों को अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद जैसी धारणाओं से बहार आकर एकजुट होकर आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए लड़ाई लडनी चाहिए. भारत ने आगे कहा कि आव्रजन की समस्या भी इसी से जुडी हैं, जो आज विश्व में तेजी से बढ़ रही है. भारत ने पूरी दृढ़ता के साथ आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाकर ही एक शांतिपूर्ण विश्वव्यवस्था का निर्माण कर सकने पर जोर दिया। आतंकवाद पर पूर्ण नियंत्रण ही मध्यपूर्व से आव्रजन जैसी मानवीय समस्या का समाधान कर सकती है. जिसपर सभी उपस्थित सदस्य राष्ट्रों ने अपनी सहमति दर्ज करायी . 

इस शिखर सम्मलेन के दौरान भारत नें जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एक बार फिर अपना पक्ष रखा. भारत ने बहुत सहजता से कहा कि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा किसी एक देश का ना होकर वैश्विक हैं इसलिए इसका हल भी वैश्विक ही निकलना चाहिए. इस मुद्दे पर तमाम सदस्य राष्ट्र अपने आपसी वैमनस्य भुलाकर एक ठोस निति बनाने की दिशा में आगे बढना चाहिए. भारत का मानना हैं कि इसपर अमेरिका को अपना पक्ष स्पष्ट करना बहुत जरुरी है क्योकि अमेरिका के पेरिस सम्मलेन से बाहर निकलने से इसका लक्ष्य भटक कर रह गया है. पेरिस सम्मिलन के तुरंत बाद भारत ने इस बात पर नाराजगी जताते हुए अमेरिका से इससे जुड़ने की अपील भी किया था. जिसपर तमाम विश्लेषक कयास लगा रहे थे कि इसका असर मोदी की अमेरिका दौरे पर पड़ेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.  दोनों देश चाहेगें कि वो अन्य सदस्य देशो के साथ मिलकर इस मुददे पर आगे बढ़ सके जिससे इस भयानक समस्या का समाधान निकला जा सके. भारत के इस प्रयास का समर्थन और प्रशंसा तमाम राष्ट्रों के साथ अंतरराष्ट्रीय संगठनो, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ, ने भी किया हैं. 

इस शिखर सम्मलेन के दौरान एक अन्य मुद्दा स्वास्थ्य का रहा. पिछले कुछ सालो में जिस तरह से सार्स, चेगास, इबोला और जिका जैसी बिमारिया सामने आई है उससे एक बात तो स्पष्ट हैं की अब कोई भी देश सुरक्षित नहीं रह गया है. इसका भी समाधान वैश्विक प्रयासों से ही निकल सक सकता हैं. भारत ने कहा कि वो एक जिम्मेदार और मानवीय लोकतंत्र के कारण हमेशा से इस बात का समर्थक रहा है कि स्वास्थ्य सुविधायें, एक सार्वभौमिक मानवाधिकार के रूप में सभी को मिलनी चाहिए. इसके लिए विकसित देशो को तकनीक, दवाइयां और प्रशिक्षण के माध्यम से विकासशील देशो का मदद  करना चाहिए. भारत इस शिखर सम्मलेन में संवेदना के साथ के साथ कहा कि इस शिखर सम्मलेन में कुछ ऐसा प्रयास हो जिससे वैश्विक स्तर पर औषधीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर भी लगाम लगाया जा सके जिससे एक समतामूलक विश्व का निर्माण हो सके और सभी को सुलभ और सस्ती दवाइयां उपलब्ध करायी जा सके. भारत के इस प्रयास पर भी उसे एनी देशो का साथ और समर्थन मिला जिसको भारत के कुटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा सकता हैं. 

भारत की दृष्टिकोण से यह सम्मलेन एक और कारण से बहुत महत्वपूर्ण रहा क्योकि, भारत, समूह २० की १४वी शिखर सम्मलेन का आयोजन करेगा. भारत ने इस सम्मलेन के दौरान वहा की प्रबन्ध और सुरक्षा को भी देखा जिससे उसे दिल्ली में होंने वाले आगामी सम्मलेन के तैयारिया करने में आसानी हो सके. यह भारत के वैश्विक महत्व को भी दर्शाता है क्योकि इसके शिखर सम्मेलनों में विश्व के सबसे ताकतवर देशो के प्रमुख हिस्सा लेते हैं. यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जायेगा और उसकी वैश्विक महत्ता को भी दर्शाता है. भारत को इस सम्मलेन के सफल आयोजन के लिए पूर्ण प्रयास करना भी चाहिए. 

ऐसा नहीं है की इस सम्मलेन के दौरान सब कुछ अच्छा ही रहा. हैम्बर्ग में खूब विरोध प्रदर्शन हुए. जर्मन पुलिस को भीड़ को भागने के लिए पानी के बौछारों और आंसू गैस के गोले का सहारा भी लेना पड़ा . पूजीवाद विरोध के नाम पर विश्व के तमाम वाम संगठन एकजुट होकर इस सम्मलेन का विरोध कर रहे थे. इन लोगो का कहना था कि इस तरह की सम्मलेन गरीब विरोधी और शोषण को बढ़ावा देने वाला होता हैं इसलिए इसका विरोध होना ही चाहिए. जोकि व्यवहारिक नहीं लगता क्योकि इसमें चीन और रूस जैसे समाजवादी देशों ने भी भाग़ लिया और लेते आये हैं. ये कुछ स्वार्थी तत्वों का विरोध प्रदर्शन मात्र हैं जिसका असर इस सम्मलेन कोई ख़ास नहीं पडा. इस पर जर्मन चांसलर अंजेला मर्कल ने सही ही कहा कि विरोध प्रदर्शन तो लोकतंत्र का आधार होता है और ये होना भी चाहिए.  

अंत में, इस वर्ष का सम्मलेन “अंतर-जुडित विश्व को आकार देना” शीर्षक के साथ संपन्न हुआ. इससे दुनिया को  बहुत उम्मीदें थी, निश्चित रूप में इसमें कुछ प्रमुख बातो को स्वीकार भी किया जैसे मजबूत, सतत, संतुलित और समावेशी विकास की बात की गई. इसके साथ ही वित्तिय संरचना सुधारना, वित्तीय स्थिरता बयूरो के एजेंडे को क्रियान्वित करना, डिजिटल वित्त, साइबर सुरक्षा, वित्तीय समाविष और साक्षरता, अंतर्राष्ट्रीय कराधान प्रणाली को सही बनाना, पारदर्शिता को बढ़ावा देना, वित्तीय प्रेषण की सुविधा को बढ़ाना, कालेधन पर रोक, डाटा साझा करना, जीवाश्म इधन को बढ़ावा देना जैसे मुद्दे पर सभी सदाशय देशो ने अपनी सहमती जताई.  भारत एक जिम्मेदार राष्ट्र और सदस्य होने कारण पूरा प्रयास किया कि यह शिखर सम्मलेन सफल हो और वह अन्य राष्ट्रों के साथ अपने हितों की पूर्ति करने में सफल हो सके. प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ भी पूरा परस किया की वो अपनी छवि को बरक़रार रखते हुए विश्व पटल पर भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर सके. इसका सबसे बड़ा उदाहरण सभी सदस्य राष्ट्रों द्वारा भारत के व्यापारिक सरलीकरण और श्रम सुधारो पर किये गए प्रयासों की प्रशंसा किया जाना. भारत के लिए ये सम्मलेन बहुत ही लाभदायक सिद्ध रहा और आने वाले समय में भारत और मुखर होकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक भूमिका निभाएगा. 

(लेखक, डॉ. शान्तेष कुमार सिंह, वर्तमान में, वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU-IIGH), कुआलालम्पुर, मलेशिया में कार्यरत हैं. 

E-mail; shanteshjnu@gmail.com, twitter; @shanteshjnu

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