शरीफ की सियासी शहादत या... - डॉ. आशीष शुक्ल

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देश की सर्वोच्च अदालत ने बीती २८ जुलाई को पनामा-कागज़ात रहस्योदघाटन के मामले में  अपना निर्णय सुनाते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मियां मुहम्मद नवाज़ शरीफ को पद पर बने रहने के अयोग्य करार दे दिया | इसके उपरांत नवाज़ शरीफ को प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र देना पड़ा| पाकिस्तान में प्रधानमंत्री के कार्यकाल को अशिष्टतापूर्वक समाप्त किया जाना कोई नई बात नहीं है| तथ्यात्मक रूप से यह पन्द्रहवां मौका है जब देश के किसी प्रधानमंत्री को समय से पहले ही उसके पद से हटाया गया हो, हालाँकि नवाज़ शरीफ के साथ दुर्भाग्यवश ऐसा तीसरी बार हुआ है| जहाँ तक न्यायपालिका का प्रश्न है, नवाज़ शरीफ से पहले २०१२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री युसुफ़ रज़ा गिलानी को भी अदालत की अवहेलना करने पर हटना पड़ा था|  देश के भीतर और बाहर कानूनी जानकारों और विश्लेषकों के बीच पनामा-कागज़ात रहस्योदघाटन पर निर्णय को लेकर एकमतता नहीं है| कुछ इसे राजनीतिक उत्तरदायित्व की स्थापना के दृष्टिकोण से एक अहम् फैसला मान रहे हैं, कुछ इसे न्यायिक तख्तापलट की संज्ञा दे रहे हैं, तो वहीँ कुछ इसके पीछे सैन्य षड़यंत्र की सम्भावना देख रहे हैं|

जो विश्लेषक इसे राजनीतिज्ञों की देश के प्रति उत्तरदायित्व से जोड़कर देख रहे हैं, उनका मानना है कि न्यायपालिका ने जवाबदेही की शुरुआत प्रधानमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करके एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की नींव डाली है जिसके अंतर्गत किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी| वहीँ दूसरी तरफ जो लोग इसे न्यायिक तख्तापलट मान रहे हैं, उनका कहना है कि न्यायपालिका ने जिस आधार पर नवाज़ शरीफ को पद पर बने रहने के अयोग्य पाया है, यदि उसे सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए तो पाकिस्तान में शायद ही कोई राजनेता होगा जो खुद को किसी पद पर आसीन होने के लायक पाएगा| गौरतलब है की सर्वोच्च अदालत ने नवाज़ शरीफ को संविधान के अनुच्छेद ६२ (१) (ऍफ़) के अतिक्रमण का दोषी पाया है| इस अनुच्छेद को सैन्य शासक जनरल ज़िया-उल-हक़ ने संविधान का हिस्सा बनाया था जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय सदन (नेशनल असेम्बली) के सदस्य को बुद्धिमान, न्यायसंगत, चरित्रवान, ईमानदार, और सच्चा होना चाहिए|  

जो लोग इसके पीछे किसी भी तरह का सैन्य षड़यंत्र देख रहे हैं, उनका मानना है कि पाकिस्तानी सेना किसी भी लोकप्रिय प्रधानमंत्री को अपने हितों की पूर्ति के मार्ग में एक अवरोधक के रूप में देखती है, अतः उसे पद से हटाने कर भरसक प्रयास करती है| यही कारण है कि  पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक केवल जुल्फिकार अली भुट्टो ही ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने न केवल अपना कार्यकाल पूरा किया बल्कि पद पर रहते हुए अगला चुनाव कराया और उसमें भाग भी लिया| हालाँकि यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि उनका कार्यकाल निर्धारित पांच वर्ष से कम रहा था| इसके पश्चात अभी तक किसी प्रधानमंत्री को अपना कार्यकाल पूरा करने का अवसर नहीं मिला| पूर्व में सेना ने अपने इस मिशन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के अतिररिक्त गवर्नर जनरल तथा राष्ट्रपति को प्राप्त विशासधिकारों का सहारा लिया था| ऐतिहासिक रूप से न्यायपालिका ने भी सेना के इस मिशन में भरपूर सहयोग दिया है| इसने न केवल आवश्यकता के सिद्धांत के आधार पर पूर्व में हुए सैन्य हस्तक्षेप को जायज़ ठहराया, बल्कि सेना के खिलाफ शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया| जस्टिस इफ्तिखार चौधरी का परवेज़ मुशर्रफ के खिलाफ मोर्चा खोलना इस सन्दर्भ में एक अपवाद है|

जहाँ तक नवाज़ शरीफ को इस बार हटाए जाने का प्रश्न है, बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही नवाज़ शरीफ ने विभिन्न माध्यमों से व्यवस्था में असैनिक निगरानी (सिविलियन ओवरसाईट) स्थापित करने का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रयास किया| नवाज़ शरीफ द्वारा भारत से रिश्ते सामान्य करने के लिए जो कदम उठाए गए, उस पर सेना ने समय-समय पर आपत्ति भी की| उदाहरण के लिए सेना के आतंरिक विरोध के बावजूद नवाज़ शरीफ ने २०१४ में नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में शिरकत की, कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात नहीं की, दो-तरफा व्यापार में दिलचस्पी दिखाई, भारत को एम. एफ. एन. या अविभेदकारी बाज़ार अभिगम्यता (नॉन-दिस्क्रिमिनेटरी मार्केट ऐक्सेस) देने पर सैधांतिक सहमति दी, उफ़ा में इस बात पर सहमत हुए कि अगले द्विपक्षीय बात-चीत में आतंकवाद एक प्रमुख मुद्दा होगा आदि आदि|

अब चूँकि नवाज़ शरीफ सत्ता से बेदखल किए जा चुके हैं, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने शाहिद खाकन अब्बासी को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया है जिसके बाद अगले चुनाव तक पंजाब प्रान्त के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा| पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) इस दौरान न केवल पूरी तयारी के साथ नवाज़ शरीफ का मुकदमा लड़ेगी, बल्कि उनके त्यागपत्र को एक “राजनीतिक शहादत” के रूप में पेश भी करेगी| नवाज़ शरीफ का राजनीतिक भविष्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा की बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ अगले चुनाव में किस तरह की नीति अपनाते हैं और जनता का उन्हें कितना समर्थन मिलता है|

(साभार: राष्ट्रीय सहारा)

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