नई इबारत लिख रहें हैं मोदी-बेंजामिन नेतान्याहू- डॉ. सलीम अहमद



अभी हाल ही में, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू (बीबी) ने अपनी छह दिवसीय भारत यात्रा संपन्न की, जोकि भविष्य में दोनों राष्ट्रों के मध्य मील का पत्थर साबित होगी. इस यात्रा से न सिर्फ दोनों देशों के मध्य अभूतपूर्व संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ेगी, बल्कि व्यापार की दृष्टि से भी दोनों देश अब सैन्य संबंधी सीमा क्षेत्र को लांघ कर असैन्य संबंधी सीमा क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं. ज्ञात होकि, अभी तक भारत इजराइल से रक्षा संबंधी तकनीक और उपकरण ही खरीदता था, लेकिन अब इजराइल भारत में आधारभूत संबंधी आवश्यक क्षेत्र जैसे कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, पर्यटन, प्राकृतिक गैस एवं पेट्रोलियम, फिल्म निर्माण, आदि नवाचार क्षेत्रों में निवेश करेगा. देखा जाये, तो इन क्षेत्रों में डिफेन्स की तुलना में दोनों देशों के बीच व्यापार की असीम सम्भावनाएं खुल गयी हैं. भारत की आधारभूत समस्याओं से निपटने के लिए हमें इजराइल की उन्नत तकनीक की आवश्यकता तो है ही. जैसे कि भारत के कई राज्यों में सूखा पड़ने के कारण जल की कठिन समस्या उत्पन्न हो गयी है जिसके कारण कृषि क्षेत्र भी सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है. ताज़े पानी के स्रोते बहुत ही तेज़ी से सिकुड़ते जा रहे हैं और खारे पानी के स्रोत उसी गति से बढ़ रहे हैं. जैसे कि इजराइल में भी पीने के पानी का अभाव है लेकिन वहां के वैज्ञानिकों ने इस आधारभूत समस्या से निपटने के लिए नवीन तकनीक को खोज़ निकाला है. इसी समस्या को दृस्तिगत करते हुए, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी को एक जीप भेंट की जिसका प्रयोग फिर से जल को साफ़ करने में किया जा सकता है, जिससे भविष्य में पीने के पानी का संकट दूर हो सकेगा. इसी प्रकार, इजराइल की उन्नत तकनीक से भारत की दूसरी आधारभूत समस्याओं से लड़ने में मदद मिलेगी.

गौरतलब है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू अपने साथ 102 कंपनियों के 130 लोगों के दल को साथ लेकर भारत यात्रा पर आये. जिस प्रकार, एक व्यापारी बाज़ार में वस्तुओं की मांग को ध्यान में रखकर अपने पास सभी तरह के सामान को साथ लेकर चलता है, और उसका मुख्य उद्देश्य अपने सामान को लोंगों की बढ़ती हुई जरूरतों के अनुसार बेचना होता है, जिससे वह उचित दाम ले सके. उसी प्रकार, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू की भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ कमाना है. इसीलिए इजराइल में भी बेंजामिन नेतान्याहू की भारत यात्रा को बहुत ही सफल माना जा रहा है. इससे न सिर्फ दोनों राष्ट्रों को लाभ मिलेगा, बल्कि एक दूसरे के के लिय सहायक सिद्ध होंगे. साथ ही, दोनों देशों के लोंगों के बीच संपर्क भी बनेगा.

अभी हाल ही में, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा की गयी जेरुसलम घोषणा के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपना वोट किया. वोट करने के पहले भारत के पास दो विकल्प थे, यदि भारत चाहता तो वह अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ती हुई संबंधों में प्रगाढ़ता को देखते हुए उनके समर्थन में अपना मत दे सकता था या उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुपस्थित रहना अच्छा विकल्प हो सकता था. जबकि इजराइली नेतृत्व की अगले महीने भारत यात्रा तो प्रस्तावित थी. लेकिन भारत ने विदेशनीति की स्वतंत्रता और फलस्तीनी मुद्दे पर अपने परम्परागत स्टैंड को बनाये रखते हुए बीच के रस्ते को चुना. राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि भारत को डोनाल्ड ट्रम्प की इस घोषणा के विरूद्ध नहीं जाना चाहिए था, जिसके लिए भारत की विदेशनीति की खुलकर आलोचना भी हुई. लेकिन ख़ास बात तो यह रही कि अमेरिका और इजराइल की ओर से भारत को लेकर कोई भी आलोचनात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुई और न ही वैदेशिक संबंधों के स्तर पर कोई विशेष परिवर्तन हुआ है. 

वैश्वीकरण के इस युग में, हर एक राष्ट्र अपने-अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने के लिए प्रयास कर रहा है. इस दौर में, विचारधारा तो बहुत पीछे रह गयी है, प्रत्येक राष्ट्र व्यावहारिक राजनीति के दृष्टिकोण से आर्थिक मोर्चों व बाज़ारों की नाकाबंदी में लगा हुआ है. मज़ेदार बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के आर्थिक आखाड़े में प्रत्येक राष्ट्र अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए मित्र और शत्रु मिलकर सहयोग कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, कई अरब राष्ट्रों के यहूदी राज्य के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंध बने हुए हैं, तो कुछ अरब देश खुलकर नहीं तो छुपकर यहूदी राज्य के साथ संबंध बनाये हुए हैं. ऐसी संभावना है कि सऊदी अरब खाड़ी देशों में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यहूदी राज्य के साथ अपने संबंधों को बनाने के लिए तैयार है. उनके लिए अब फलस्तीनी मुद्दा अहम् नहीं रहा, बल्कि राष्ट्र हित उनकी प्राथमिकता पर हैं. ऐसे में, भारत को भी अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए चूकना नहीं चाहिए. इसीलिए पी. एम. मोदी ने पश्चिम एशिया की क्षेत्रीय राजनीति की नाढ़ी को पकड़ते हुए, गत वर्ष अपनी इजराइल यात्रा के दौरान स्पष्ट कर दिया था कि उनकी यह यात्रा सिर्फ इजराइल की यात्रा होगी, जिसमे फलस्तीन को खुलकर नज़रंदाज़ किया गया था, और अब अगले महीने पी. एम. मोदी फलस्तीन की आधिकारिक यात्रा संभावित है, जिसमें खुलकर इजराइल को नज़रंदाज़ किया जायेगा. 

पी. एम. मोदी के द्वारा अपनायी गयी फलस्तीन-इजराइल को लेकर “डी-हाइफ़नेटेड” की नीति बहुत ही कारगार साबित हुई. परिणामस्वरुप, अब भारत की विदेशनीति फलस्तीन-इजराइल को लेकर पूर्ण रूप से स्वतंत्र है, और दोनों राष्ट्रों के साथ हमारे वन-टू-वन स्तर पर वैदेशिक संबंध विकसित हो रहें है. इससे पहले, भारत के लिए दोनों के साथ संतुलन बनाये रखना बहुत ही कठिन कार्य था. लेकिन अब भारत के इन दोनों देशों के साथ ही साथ अन्य अरब देशों के साथ भी संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ रही है. (साभार)

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