रिहाई की पहेली - डॉ. आशीष शुक्ल

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पाकिस्तान में विडम्बनाएं अपनी हज़ार मौतों के बाद भी जिन्दा रहती हैं जो उसे कहीं न कहीं विडम्बनाओं के देश (लैंड ऑफ आयरनीज) के रूप में परिभाषित करती हैं| अभी ज्यादा समय नहीं बीता है जब देश की सर्वोच्च अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को पनामा कागज़ात (पनामा पेपर्स) से जुड़े मसले पर सत्ता में बने रहने के लिए अनुपयुक्त पाया था| इसके पश्चात नवाज़ शरीफ को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था| और अब लाहौर उच्च-न्यायालय के तीन जजों से बनी प्रान्तीय समीक्षा समिति (प्रोविंशियल रिव्यू बोर्ड) ने बीते २२ नवम्बर को पंजाब सरकार के निवेदन को अस्वीकार करते हुए मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी और कर्ता-धर्ता हाफिज़ सईद को रिहा करने का निर्देश जारी कर दिया| जिसके बाद २३ नवम्बर की शाम को १० मिलियन अमेरिकी डॉलर के इनामी और वैश्विक रूप से कुख्यात आतंकवादी हाफिज़ सईद को नजरबंदी से आज़ाद कर दिया गया| अब तक कुल मिलाकर यह चौथा मौका है जब हाफिज़ सईद को पाकिस्तान ने नजरबन्द करने के कुछ समय बाद बिना किसी प्रभावी कार्यवाही के रिहा कर दिया| इसके पहले उसे वर्ष २००१ में भारतीय संसद पर हुए हमले के लिए, २००६ में अन्य सरकारों से रिश्ते ख़राब करने वाली गतिविधियों के संचालन के चलते, तथा २००८ में मुंबई आतंकवादी हमले के सन्दर्भ में नजरबन्द किया गया था|

अपनी हालिया रिहाई के अगले ही दिन हाफिज़ सईद ने जमात-उद-दावा के मुख्यालय स्थित जामिया अल-कदसिया मस्जिद में न केवल  जुमे की नमाज का नेतृत्व किया, बल्कि धर्मोपदेश के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और भारत के खिलाफ जहर भी उगला| रिहाई के बाद अपने पहले ही वक्तव्य में सईद ने  नवाज़ शरीफ को उनके भारत के प्रति अपनाए गए “लचीले” रवैये के लिए गद्दार की संज्ञा दी और कहा कि उन्हें भारत के साथ दोस्ताना सम्बन्ध रखने और कश्मीर मसले को दरकिनार करने के लिए हटाया गया| इसके अतिरिक्त सईद ने भारत पर पाकिस्तान के अंदर अतिवादिता एवं आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पाकिस्तान का दुष्टतम शत्रु बताया|

अचानक सामने आए इस ताजा घटनाक्रम से भारत और अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में कड़वाहट और अधिक बढ़ गयी है| भारत और अमेरिका दोनों देशों ने पाकिस्तान के द्वारा इस कुख्यात आतंकवादी को रिहा करने के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है| भारत ने जहाँ इसे पाकिस्तान द्वारा अपनाई जा रही भारत-विरोधी नीतियों की निरंतरता और निषिद्ध आतंकवादियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास बताया है, वहीँ अमेरिकी विदेश विभाग (स्टेट डिपार्टमेंट) की प्रवक्ता हीथर नोएर्ट ने कहा कि अमेरिका इस मामले को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है| इसके अतिरिक्त पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में स्थित अमेरिकी दूतावास द्वारा जारी किये गए वक्तव्य में लश्कर-ए-तय्यबा (एल-ई-टी) को एक नामित वैश्विक आतंकवादी संगठन कहा गया है और पाकिस्तानी सरकार को हाफिज़ सईद को गिरफ्तार करने तथा उसके द्वारा किए गए अपराधों के लिए उसपर मुकदमा चलाने का सुझाव दिया गया है|

गौरतलब है कि आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही को लेकर लगातार बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव के मद्देनजर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त की सरकार ने जनवरी २०१७ में हाफिज़ सईद को आतंकवाद-विरोधी क़ानून १९९७ की धारा ११-ईईई (१) के तहत ९० दिनों के लिए उसके घर में ही नजरबन्द किया था| इस अवधि के समाप्त होने के फ़ौरन बाद उसे लोक-शांति बनाए रखने वाले अध्यादेश (मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर आर्डिनेंस) के अंतर्गत अगले तीस दिनों तक नजरबन्द रखा गया| पाकिस्तानी संविधान की धारा १० (४) के प्रावधान के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी विदेशी मामले में संलिप्तता या लोक-शांति बनाए रखने से सम्बंधित मामले में तीन महीने से अधिक समय तक नजरबन्द रखने के लिए यथोचित समीक्षा समिति (अप्रोप्रिएट रिव्यू बोर्ड) के अनुमोदन की आवश्यकता होती है|

इस मामले पर अब तक आयी वैश्विक प्रतिक्रियाओं का जवाब देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि हाफिज़ सईद की रिहाई का आदेश न्यायालय ने एक जटिल प्रकिया अनुपालन करने के पश्चात दिया है| कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि सबूतों के नितांत अभाव में हाफिज़ सईद को और अधिक समय तक नजरबन्द नहीं किया जा सकता था| यहाँ यह बात समझना महत्वपूर्ण है कि अपने हालिया इनकार के पहले, तीन जजों की समीक्षा समिति हाफिज़ सईद की नजरबंदी को जारी रखने के लिए लगातार अपनी सहमति देती चली आ रही थी| आतंकवाद-विरोधी क़ानून १९९७ के अनुसार किसी व्यक्ति की नजरबंदी १२ महीने से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती है| यह पाकिस्तान और उसके विभिन्न संस्थाओं की जिम्मेदारी थी कि नजरबंदी की अवधि समाप्त होने से पहले उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत जुटाएं और जरूरी कार्यवाही करें| लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से लगभग ३०० दिनों या १० महीने की नजरबंदी के दौरान पाकिस्तान द्वारा हाफिज़ सईद के खिलाफ न तो कोई मुकदमा चलाया गया, और न ही उसके ऊपर लगे आरोपों को सत्यापित करने के लिए कोई ठोस प्रयास किया गया| वह भी तब, जब पाकिस्तान स्वयं लगभग प्रत्येक वैश्विक मंच पर आतंकवाद का शिकार होने का ढिंढोरा पीटता फिरता है|

अब सवाल यह भी उठता है कि आखिर पाकिस्तानी सेना के द्वारा चलाए गए ऑपरेशन शेरदिल से लेकर राह-ए-रस्त, राह-ए-निजात, जर्ब-ए-अज्ब और रदद्-उल-फसाद का क्या फायदा जब पाकिस्तान के हाथ से एक वैश्विक रूप से नामित और १० मिलियन डॉलर का इनामी आतंकवादी प्रक्रियात्मक कमियों का फायदा उठाते हुए फिसल जाता है| हाफिज़ सईद की रिहाई का समय भी अपने आप में एक पहेली से कम नहीं है जो अपने अंदर बहुत से राज़ समेटे हुए है|

उल्लेखनीय है कि यह रिहाई एक ऐसे समय पर हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच आधिकारिक तौर पर अधिक संपर्क नहीं है, और भारत मुंबई हमलों के एक और साल बीत जाने पर आत्मचिंतन कर रहा है तथा बहुत से अनसुलझे सवालों के जवाब खोज रहा है| ऐसे समय में हाफिज़ सईद का पाकिस्तान में आजाद होना निश्चित रूप से एक साजिश की तरफ इशारा करता है| इस वक्त भारत की और से दी जाने वाली प्रत्येक प्रतिक्रिया के जवाब में पाकिस्तान खुद हाफिज़ सईद को आगे कर सकता है| आने वाले कुछ दिनों में हमें इसकी झलक हाफिज़ सईद द्वारा दिए जाने वाले वक्तव्यों से मिलने की उम्मीद है| इस हालिया घटनाक्रम से एक बात पुनः निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि पाकिस्तान आज भी आतंकवाद को एक “रणनीतिक परिसंपत्ति” और “विदेशनीति के अस्त्र” के रूप में देखता है| हाफिज़ सईद और उसके जैसे बहुत से अन्य अतिवादियों एवं आतंकवादियों को पाकिस्तान “अच्छे जिहादी” की श्रेणी में रखता है क्योंकि वो कभी भी पाकिस्तान और उसकी सेना के लिए किसी तरह की मुश्किल पैदा नहीं करते हैं| इन जेहादियों का उपयोग अक्सर भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए किया जाता है| ऐसी स्थिति में भारत को चाहिए कि वह अपने मित्रों, सहयोगियों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर एक साझा रणनीति बनाए और उस पर अमल भी करे|

(साभार: राष्ट्रीय सहारा)

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