पाकिस्तान पर दबाव बनाने के पीछे कहीं अमेरिका की ये रणनीति तो नहीं- डॉ. श्रीश पाठक


"अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण रीति से पिछले पंद्रह सालों में सहायता के नाम पर तैतीस बिलियन से भी अधिक राशि पाकिस्तान को दी है, और उन्होंने हमें बस झूठ, धोखा दिया है कि जैसे हमारे नेता मूर्ख हों। उन्होंने उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह दी, जिन आतंकवादियों को हम अफ़ग़ानिस्तान में उनकी थोड़ी सहायता से खोज रहे थे। … अब नहीं !"




अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने नए साल के अपने छठे ट्वीट से दक्षिण एशियाई, खासकर पाकिस्तानी राजनीति में खलबली मचा दी। ट्रम्प के बयानों को लेकर विश्लेषक कुछ पसोपेस में रहते हैं, जो अक्सर अस्पष्ट, विरोधाभासी और सनसनीखेज होते हैं, किन्तु यह ट्वीट बेहद करारा, स्पष्ट और निर्णायक था। भारत-अमेरिकी रिश्तों की तुलना में अमेरिकी-पाकिस्तानी रिश्ते ज्यादा गहरे और शीतकालीन समय के जांचे-परखे रिश्ते रहे हैं, ऐसे में जबकि भारत-अमेरिका रिश्तों की ऊष्मा बढ़ रही तो भारत के लिए भी यह ट्वीट खास मानी गयी। 

ट्रम्प के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान की तिलमिलाहट साफ़ दिखी और पाकिस्तान के विदेश मंत्री जनाब ख्वाजा मोहम्मद आसिफ साहब ने उसी ट्विटर पर कई करारे जवाब दिये और लिखा कि जल्द ही पाकिस्तान ट्रम्प को जवाब देगा और सच और झूठ अलग-अलग हो जायेंगे। पाकिस्तान ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेल को इस सन्दर्भ में तलब किया और प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी की अध्यक्षता में राष्टीय सुरक्षा समिति (एन.एस.सी.) की बैठक हुई जिसमें हाल-फिलहाल कई स्तरों से की जा रही देश की अमेरिकी आलोचनाओं पर बात हुई। पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्तों में ठंडक की सुगबुगाहट कम-अधिक एक अरसे से दिख रही है पर दिसंबर से यह सर्द सतह पर नजर आने लगी है। दिसंबर में अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा में अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रयासों में उसकी सिकुड़ी भूमिका की कई बार आलोचना की। फिर तो इसी मुद्दे के बहाने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों की झड़ी लगती रही, कभी विदेश सचिव रेक्स टिलरसन, कभी निकी हैले तो कभी जेम्स मैटिस और कई मंचों पर कई बार राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पाकिस्तान की खिंचाई की। अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के मसविदे में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की आलोचना की। पाकिस्तान को दी जा रही नॉन नाटो रक्षा सहूलियतों में कटौती की बात की गयी और निकी हैले के हवाले से पाकिस्तान को दी जाने वाली 255 मिलियन डॉलर की सहायता राशि को फ़िलहाल स्थगित करने की सुचना दी गयी। 

अमेरिका और पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों की प्रकृति हमेशा से सामरिक रही है जिसमें ‘आदान-प्रदान’ की मुख्य भूमिका रही है और यह रिश्ता एक विश्व-शक्ति का एक क्षेत्रीय राष्ट्र से था। विश्व-राजनीति में विश्व-शक्ति होने का एक व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि वह ग्लोब के प्रत्येक सामरिक क्षेत्रों में उसका एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि होना चाहिए जो उस क्षेत्र-विशेष में उसके हितों को सुनिश्चित करने में मदद करे। पाकिस्तान ने वह भूमिका अपने लिए स्वीकार कर ली। ब्रिटिश दासता से मुक्ति के पश्चात् जहाँ भारत ने स्वतंत्र विदेश नीति की चाह में निर्गुट आंदोलन की राह पकड़ी, वहीं पाकिस्तान ने अमेरिकी गुट में शामिल होना मुफीद समझा। अमेरिका ने पाकिस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाया और पाकिस्तान को रक्षा और आर्थिक सहायता मिलती रही। जब भी इस लेन-देन में किसी भी पक्ष से कसर रही, आपसी रिश्तों में खींचातानी देखने को मिली। 1971 तक अमेरिका, भारत और पाकिस्तान दोनों से ही सामरिक रिश्तों की जुगत में लगा रहा ताकि अमेरिका के पास सौदेबाजी की शक्ति (बार्गेनिंग) बनी रहे और एशिया क्षेत्र में वह निर्णायक बना रहे। हालाँकि अमेरिका के रिश्ते पाकिस्तान से ही प्रगाढ़ रहे, भारत से रिश्तों में एक हिचक ही बनी रही। फिर 1998 के परमाण्विक परीक्षण के बाद अमेरिकी उप विदेश सचिव स्ट्रोब टालबोट और तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह की अट्ठारह राउंड की भारतीय लिहाज से बेहद सफल वार्ता हुई जिसके के बाद से ही अमेरिका-भारत के रिश्तों की नयी मजबूत बुनियाद पड़ी। 

ट्रम्प के ट्वीट में पिछले पंद्रह सालों का हवाला दिया है। स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की एबोटाबाद ऑपरेशन तक के पाकिस्तानी सहयोग को चिन्हित किया गया है और उसके बाद के पाकिस्तानी सहयोग को ‘बहुत थोड़ा और विरोधाभासी’ कहा गया है। निश्चित ही साल 2012 पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में एक महत्वपूर्ण साल है। अमेरिका के एबोटाबाद ऑपरेशन की पाकिस्तान की भीतरी राजनीति में बेहद आलोचना हुई। एक तो ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तानी मिलिटरी बेस के भीतर सुरक्षित पाया जाना और फिर अमेरिका का एकतरफा ऑपरेशन जिसमें पाकिस्तानी सरकार कुछ यों पेश आयी कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था; इसे पाकिस्तानी संप्रभुता का भीषण हनन माना गया और जो था भी। इससे पहले परवेज़ मुशर्रफ ने 2009 में खुलकर स्वीकार कर लिया था कि अमेरिकी सहायता का एक बड़ा हिस्सा भारत के खिलाफ पाकिस्तानी रक्षा बजट में खर्च किया जाता है। फिर इधर अमेरिका के रिश्ते जितने ही भारत से बढ़ते गए, पाकिस्तान के रिश्ते उभरते विश्व शक्ति चीन से बढ़ते गए। भारत से अमेरिकी मेलजोल जहाँ पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा था वहीं चीन से पाकिस्तानी मेलजोल अमेरिका को पसंद नहीं था। बदलते विश्व-राजनीति में पाकिस्तान के हितों के लिए एक मजबूत पड़ोसी के रूप में चीन से संबंध निश्चित ही मुफीद है जो कि भारत-चीन के खट्टे रिश्तों को देखते हुए पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर के भारत-विरोध को भी तुष्ट करता है। फिर चीन न केवल भौतिक रूप से पाकिस्तान से अधिक सम्बद्ध है अपितु आर्थिक और सामरिक परिप्रेक्ष्य में भी यह तब और अनुकूल हो जाता है जब इस समीकरण में महत्वाकांक्षी पुतिन का रूस भी शामिल हो जाता है। अमेरिकी नाराजगी के मूल में महज पाकिस्तान से ‘अफग़ानिस्तान में अपेक्षित सहयोग’ का मिलना ही नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान का धीरे-धीरे चीन, रूस और उत्तर कोरिया के साथ सम्बद्ध हो जाना है। अफगानिस्तान कार्ड तो महज एक दबाव की कार्यनीति है। चीन की ओबोर नीति और बढ़ती सामरिक सक्रियता ने ही अमेरिका को मजबूर किया है कि वह दक्षिण एशिया क्षेत्र को एशिया-प्रशांत क्षेत्र की वृहद् दृष्टि से देखे, जिसमें चीनी सामरिक प्रभाव को भारतीय केंद्रीय भूमिका से संतुलित किया जा सके। 

दरअसल चीन-रूस-पाकिस्तान-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) के जवाब में ही अमेरिका-भारत-जापान-आस्ट्रेलिया का चतुष्क (क्वाड) निर्मित किया गया है और ट्रम्प का यह ट्वीट और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा की जा रही लगातार आलोचना एंटीक्वाड की एक प्रमुख धुरी पाकिस्तान पर दबाव बनाकर इसी एंटीक्वाड को  कमजोर करने की रणनीति है। व्यवसायी ट्रम्प की राजनीतिक शैली वैश्वीकरण के दौर की प्रचलित मल्टीलैटरलिज्म (बहुपक्षीयवाद) के स्थान पर बाईलैटरलिज्म (द्विपक्षीयवाद) की है जो ट्रम्प की संरक्षणवादी ‘अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी’ से भी मेल खाती है और अमेरिकी प्रभुत्व को मिलने वाली बहुपक्षीयवाद की चुनौती से भी सुरक्षा मिलती है। द्विपक्षीयवाद नीति में ट्रम्प अपने प्रत्येक सहयोगी राष्ट्र से  उनकी भूमिका की जवाबदेही स्पष्ट चाहते हैं, जिसके एवज में उन्हें अमेरिकी तवज्जो दी जाती है। इस साल नवम्बर में अमेरिका में कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों की सम्भावना ट्रम्प को अमेरिकी अवाम के नजर में सक्रिय और अमेरिकी डॉलर व अमेरिकी हितों के लिए प्रतिबद्ध दिखते रहने को मजबूर करती है। ट्रम्प के चुनावी वादे ही हैं जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के जान-माल के नुकसानों को न्यूनतम करने के उद्देश्य से पाकिस्तान और भारत से अफ़ग़ानिस्तान में और अधिक सक्रियता की बार-बार मांग करते हैं। यकीनन, अमेरिका के रिश्ते भारत से मजबूत हो रहे हैं और पाकिस्तान से उनके रिश्तों में तनाव है पर भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका का पाकिस्तान से रिश्तों में तनाव की दीर्घकालिक सम्भावना तलाशना कठिन ही है।  

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