भारतीय राष्ट्रवाद और कैटेलोनिया विवाद-डॉ. श्रीश पाठक



इस सहस्त्राब्दी के प्रारंभ से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को ‘विश्वराजनीति के वैश्वीकरण की प्रक्रिया’ के तौर पर देखने की वकालत की जाती है. ९/११ की अमेरिकी घटना ने अध्ययन के इस प्रवृत्ति की उपादेयता भी सिद्ध की है. विश्वराजनीति के वैश्वीकरण का तात्पर्य यह है कि अब विश्व के किसी भी स्थानीय घटना का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य है और किसी वैश्विक परिप्रेक्ष्य अथवा परिघटना का एक स्थानीय असर भी महत्वपूर्ण है. आज की विश्वराजनीति में इसलिए ही अंतरसंबंधन (इंटरकनेक्टेडनेस) एक प्रभावी पहलू है. इस दृष्टिकोण से इस समय स्पेन में चल रहे कैटेलोनिया विवाद के निहितार्थ भारतीय सम्बन्ध में भी महत्वपूर्ण हैं. स्पेन का एक महत्वपूर्ण राज्य कैटेलोनिया अपनी स्वतंत्रता की मांग कर रहा है और समूचा पश्चिम ही स्पेन के पक्ष में खड़ा है और कैटेलोनिया की स्वतंत्रता को एक अनचाहा, गैर-जरुरी और विधि-असंगत करार दिया है.  

कैटेलोनिया की राजधानी बार्सीलोना विश्व समाज में अपने कुशल खेल आयोजनों के लिए जानी जाती है जो इससमय यूरोप सहित पुरे विश्व में अपने आजादी के आंदोलनों के लिए जाना जा रहा है. १९३९ के गृहयुद्ध के पहले तक स्पेन ने संसदीय संविधान का अनुपालन किया था किन्तु इसके बाद जनरल फ्रांसिस्को फ्रैंको के नेतृत्व में १९७५ में उनकी मृत्यु तक स्पेन ने अधिनायावादी शासन झेला. प्राचीन मध्यकाल की ऐतिहासिक विरासत वाले कैटेलोनियाई समाज ने अपनी अलग भाषा, संस्कृति और अस्मिता अक्षुण्ण बनाये रखी है. नौवीं शती में बार्सिलोना प्रभाग का गठन कुछ छोटे छोटे भूभागों को मिलाकर किया गया ताकि पश्चिमी यूरोपियन देशों और मुस्लिम शासित स्पेन के बीच एक प्रतिरोधक मध्यवर्ती राज्य (बफर स्टेट) बनाया जा सके. यहीं से कैटेलोनिया अपनी पृथक और खास अस्मिता गढ़ सका. कालांतर में यह स्पेन का भाग बना भी तो इसकी पृथक अस्मिता बनाये रखने की जद्दोजहद चलती रही. पूरा यूरोप जब राष्ट्रवाद की उन्मादी आग में तप रहा था तब उन्नीसवीं शताब्दी में कैटेलोनिया में भी राष्ट्रवाद ने जोर पकड़ा और इसने पृथक स्वतंत्र राष्ट्र बनने की अपनी स्वाभाविक महत्वाकांक्षा प्रदर्शित की. 

१९७८ के नए स्पेनिश संविधान ने कैटेलोनिया को वह स्वायत्तता प्रदान की जिसकी फ्रांसिस्को फ्रैंको के तानाशाही में निर्ममता से अवहेलना की गयी. स्पेनिश संविधान, फ़्रांस और इटली के संविधानों की तरह ही एकात्मक संविधान है जहाँ केंद्र को राज्यों की तुलना में अधिक वरीयता दी जाती है. इसके उलट यदि अमेरिका और भारत जैसे राष्ट्रों की तरह यदि स्पेन में भी संघीय सरंचना अपनायी जाती, जिसमें राज्य ईकाईयां केंद्र की तरह ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली होती हैं तो शायद कैटेलोनिया एक स्पेनिश झंडे के अधीन अपनी पृथक अस्मिता के साथ न्याय कर सकता और यह राज्य अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए संघर्षरत न होता. अमेरिका ने और भारत ने अपनी रीति से संघीय व्यवस्था अपनाकर अपने यहाँ यह सुनिश्चित किया है. यहाँ राज्य केंद्र के मातहत नहीं अपितु अपनी पृथक अस्मिता के साथ राष्ट्रविकास में सहयोग कर रहे हैं. अब कैटेलोनिया जो अपने पृथक इतिहास, भाषा और संस्कृति के साथ स्पेन के सोलह प्रतिशत लोगों का घर है, जिसका देश के निर्यात में लगभग छब्बीस प्रतिशत का योगदान है, जिसकी देश के समूचे जीडीपी में उन्नीस प्रतिशत की भागेदारी है और जो स्पेन के सर्वाधिक विकसित राज्यों में है तथा जहाँ देश के कुल विदेशी निवेश का लगभग २१ प्रतिशत निवेशित है; स्वाभाविक है कि संविधानप्रदत्त स्वायत्तता इस राज्य के लिए पर्याप्त नहीं है. स्पेन के बाकी राज्य यदि संविधान में परिवर्तन की मांग कर संविधान की प्रकृति को संघवादी करने का प्रयास करते तो संभवतः कैटेलोनिया एक अलग राष्ट्र-राज्य की अपनी मांग स्थगित रखता. 

कैटेलोनिया विवाद को राष्ट्रवाद के विमर्श के रूप में भी देखने की जरुरत है. राष्ट्रवाद की संकल्पना अपने आधुनिक विकास में पश्चिमजनित है. इस तरह के राष्ट्रवाद का नारा एकरूपता का है. एक झंडा, एक भाषा, एक संस्कृति से मिलकर एकता तक पहुँचने की निष्ठा का नाम पश्चिमी राष्ट्रवाद है. भारत जैसे देश के लिए राष्ट्रवाद का यह पश्चिमी संस्करण ज्यों का त्यों स्वीकारने का मतलब यह था कि कि देर-सबेर इस महान राष्ट्र के कई टुकड़े होते और यही सोचकर चर्चिल ने भारत राष्ट्र की संकल्पना की खिल्ली भी उड़ाई थी और इसके जल्द ही समाप्त हो जाने की भविष्यवाणी भी की थी. किन्तु भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस राष्ट्रवाद की बुनियाद रखी उसका आधार विभिन्नता को बनाया और अनेकता में एकता के दर्शन करने की वकालत की. भारतीय राष्ट्रवाद एकरूपता अथवा समरूपता का लक्ष्य लेकर नहीं आगे बढ़ा अपितु इसमें देश की सभी विभिन्न संस्कृतियों और अस्मिताओं को स्थान मिला. पिछले सत्तर सालों में आधुनिक भारत ने एकबद्ध होकर भारतीय राष्ट्रवाद के रूप को सही साबित कर दिया है. यकीनन राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया सतत है और कतिपय अलगाववादी आन्दोलन भी जब तब सतह पर दिखाई पड़ते हैं किन्तु इतनी प्रचुर सांस्कृतिक और विराट ऐतिहासिक विमाओं वाले देश में इतना स्वाभाविक है और समय के साथ विकास के मलहम से उसपर यकीनन काबू पाया जा सकेगा. 

किन्तु आधुनिक राष्ट्रवाद की जन्मभूमि यूरोप ने राष्ट्रवाद की अपनी संकल्पना इतनी संकीर्ण रखी है कि इसने यूरोप को दो-दो विश्वयुद्धों से झुलसाया ही, अभी यूरोप में दो दर्जन से अधिक ऐसे अलगाववादी आन्दोलन चल रहे हैं जो किसी भी समय अपनी पृथक अस्मिता के साथ नए राष्ट्र बनने को तत्पर हैं. कैटेलोनिया की जनता ने जनमत परीक्षण में और कैटेलोनिया सांसदों ने संसद में नए कैटेलोनिया राष्ट्र के पक्ष में मतदान किये हैं. मैड्रिड ने बार्सीलोना की सरकार को अपदस्थ को इस दिसंबर में नए चुनाव कराने का आदेश दे दिया है और पहली बार संविधान की धारा १५५ का प्रयोग करके कैटेलोनिया राज्य पर केंद्र सरकार को निर्णायक बना दिया है. अब यह स्वाभाविक है कि समूचा पश्चिम ही एकस्वर से कैटेलोनिया की मांग के खिलाफ एकजुट हो गया है, क्योंकि सभी के राष्ट्रवाद में विभिन्नता की गुंजायश कम है और इससे उनके अपने राष्ट्र-राज्य की संरचना पर गहरा असर पड़ेगा. एक बार कैटेलोनिया आजाद हुआ तो स्कॉटलैंड, आयरलैंड, वेल्स, वैलोनिया, कोर्सिका, बावरिया, मोराविया, इस्ट्रीया, सिसली, वेनितो आदि सहित दो दर्जन से अधिक राज्य, स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य बनने का प्रयत्न करेंगे. यूरोपियन यूनियन ने कैटेलोनिया को धमकी दी है कि उनका अलग होकर यूनियन में दुबारा शामिल होने की कोशिश कठिन और लम्बी तो होगी ही, इसमें कोई निश्चितता भी नहीं होगी. जर्मनी, फ़्रांस, अमेरिका सहित लगभग सभी प्रमुख पश्चिमी राष्ट्रों के बयान कैटेलोनिया की मांग के खिलाफ ही हैं. 

कैटेलोनिया की आजाद होने की डगर जितनी कठिन है उतनी ही कठिन समस्या यह स्पेन सहित समूचे पश्चिम की भी है क्योंकि इस बार यह संकट काफी गहरा है. इस घटना से भारत को भी सीख लेने की आवश्यकता है कि यह अपने राष्ट्रवाद की खासियत को समझे और अनेकता को संजोकर रखे ताकि राष्ट्र की एकता मजबूती बनी रहे. 

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