भारत और तुर्की के मध्य प्रगाढ़ होते संबंध-डॉ. सलीम अहमद




२१वीं शताब्दी में भारत और तुर्की के मध्य सम्बन्ध बहुत ही तेजी से प्रगाढ़ता की ओर बढ़ रहे हैं. दोनों राष्ट्रों के मध्य संबंधों में आर्थिक सहयोग और आतंकवाद सामान्य मुद्दे हैं जिनको लेकर दोनों देशों का द्रष्टिकोण सामान है. लेकिन भारत और तुर्की संबंधों को जानने से पहले इन दोनों राष्ट्रों की पृष्ठभूमि को समझना जरुरी है कि किस प्रकार दोनों राष्ट्र विरोधी गुटों में शामिल होने के कारण एक दुसरे से दूरी बनाये हुए थे. और जब वैश्विक स्तर पर गुणात्मक परिवर्तन हुआ तो दोनों देशों ने एक दुसरे की कमियों को दरकिनार करते हुए आर्थिक और राजनैतिक संबंधो की मज़बूत आधारशिला रखीं. ज्ञात हो कि ३० अप्रैल २०१७ को, तुर्की के राष्ट्रपति २ दिवसीय यात्रा के लिए नयी दिल्ली आ रहे है.

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात, सम्पूर्ण विश्व दो विरोधी विचारधाराओं की लड़ाई में बंटा हुआ था. जहाँ एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका (यू. एस. ए.) पूंजीवाद का प्रचार और प्रसार करने में लगा हुआ था, वहीँ दूसरी ओर सोवियत संघ (यू. एस. एस. आर.) साम्यवादी विचारधारा के प्रचार और प्रसार में लगा हुआ था. यह शीत युद्ध का दौर था जिसमें विश्व के नव स्वतंत्र राज्यों को वित्तीय और सैनिक सहायता देकर दोनों विश्व की शक्तियां अपनी ओर मिलाना चाहती थी. उस समय तुर्की, नाटो (NATO) का एक सदस्य जोकि एक सैनिक संगठन है, अमेरिकी खेमे में, और दूसरी ओर, भारत सोवियत खेमे में विभाजित हो चुके थे. भारत और तुर्की के मध्य विचारधारा का अंतर होने के कारण दोनों राष्ट्रों के मध्य कूटनीतिक सम्बन्ध विकसित न सके. लेकिन उस समय तुर्की के पाकिस्तान के साथ बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध थे, क्योंकि पाकिस्तान भी अमेरिकी खेमे में शामिल था. वास्तव में, तुर्की पाकिस्तान का दक्षिण एशिया क्षेत्र में एक घनिष्ठ मित्र था, और तुर्की ने सदेव कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दिया, लेकिन भारत ने भी सायप्रस मुद्दे पर तुर्की के विरूद्ध ग्रीस का साथ दिया. अतः शीत युद्ध के दौरान, भारत और तुर्की के मध्य सम्बन्ध एक-दूसरें के विरुद्ध रहे, लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात, भारत और तुर्की की विदेशनीतियों में सकारात्मक परिवर्तन हुआ. 

उत्तर शीत युद्ध के दौरान विश्व पटल पर बदलाव हो रहे थे, भारत और तुर्की ने अवसर और चुनोतियों को ध्यान मे रखते हुए संबंधों को विकसित करना शुरू किया. और इस सकारात्मक पहल ने दोनों राष्ट्रों के व्यावहारिक द्रष्टिकोण को प्रदर्शित किया. भारत और तुर्की के संबंधों को घनिष्ठ बनाने में आतंकवाद और आर्थिक सहयोग एवं व्यावसायिक लाभ, इन क्षेत्रों का महत्वपूर्ण योगदान है. क्योंकि भारत ने उस समय आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपनाया था और भारत की अर्थव्यवस्था के बंद दरवाजें विश्व के अन्य देशों के लिए खोल दिए गए थे. ये भारत और तुर्की के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी बल्कि वास्तव में ये दोनों राष्ट्रों के लिए आवश्यक था कि वह अपने-अपने राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं का विकास एवं आधुनिकीकरण करें. उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर भारत और तुर्की ने उदारीकरण का मार्ग अपनाते हुए दोनों देशों ने कूटनीतिक संबंधों को मज़बूत आधार प्रदान किया. 

भारत के द्रष्टिकोण से, तुर्की की भू-राजनैतिक स्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है जोकि दोनों राष्ट्रों के मध्य आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने एवं यूरोप में भारत के प्रवेश के लिए अवसर प्रदान कराती है. तुर्की यूरोप और एशिया के मध्य सेतु का काम करता है जोकि भारत के लिए आर्थिक और भविष्य में बढ़ती हुई ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत ही उपयोगी है. तुर्की भारत को यूरोप, काकेशस, सेंट्रल एशियाई राज्यों, और दूसरें पश्चिमी एशियाई देशों के साथ आयात-निर्यात, व्यापार, निवेश, व्यवसाय, एवं संयुक्त उपक्रम आदि के बहुमूल्य अवसर प्रदान करता है. दूसरी ओर, तुर्की के द्रष्टिकोण से, भारत की उदारीकृत अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण के युग में बहुत ही तेज़ी से आगे बढ़ रही है और भारत के विशाल बाज़ार, सैन्य शक्ति, प्राकृतिक स्रोत, वैज्ञानिक क्रांति एवं सूचना प्रौद्योगिकी, तकनीकी कौशल आदि में आपार संभावनाएं है. एक और मुख्य बात यह है की दक्षिण एशिया में भारत की भू-राजनैतिक स्थिति एवं चीन और रूस का समीप होना, तुर्की के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. लेकिन ज्ञात रहे, भारत और तुर्की के मध्य आर्थिक सहयोग ही राजनीतिक तालमेल के लिए शक्तिशाली आधार प्रदान करता है, इसीलिए जब कभी भी दोनों देशों के मध्य उच्च स्तर पर द्विपक्षीय यात्राएँ हुई तो इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि कैसे दोनों राष्ट्रों के मध्य व्यापार को बढ़ावा दिया जाये और आर्थिक विकास के अन्य क्षेत्रों को मिलकर विकसित किया जाये. भारत द्वारा तुर्की को निर्यात की जा रही मुख्य वस्तुऐ जैसे कॉटन, सूती कपड़े, कृत्रिम धागा, कार्बनिक रंजक, कार्बनिक पदार्थ, डेनिम, इस्पात, ग्रेनाइट, एंटीबायोटिक्स, कारपेट्स, जिंक, सेसमे बीज, टेलीविजन, मोबाइल्स, कपड़े इत्यादि. दूसरी ओर, तुर्की के द्वारा भारत को निर्यात कि जा रही वस्तुए जैसे गाड़ियों के पुर्ज़े, मार्बल, टेक्सटाइल मशीनरी, हैण्डलूम्स, डेनिम, कारपेट्स, जीरा दाने, खनिज पदार्थ, लोह उत्पाद सामान इत्यादि. तुर्की की वर्तमान जनसँख्या लगभग ८ करोर है और तुर्की में उपभोक्ता संस्कृति बहुत ही तेज़ी से पनप रही है जोकि भारत को निर्यात के आकर्षक अवसर उपलब्ध कराती है. दूसरी ओर, तुर्की चाहता है कि भारतीय कंपनिया यहाँ पर ज्यादा से ज्यादा पूंजी का निवेश करें, मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी एवं कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के क्षेत्रों में. इस प्रकार, भारत और तुर्की वर्तमान में आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को लेकर दृढ़ निश्चय किये हुए है. विद्वानो का मानना है की भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार में सकारात्मक वृद्दि होने की सम्भावना है क्योंकि तुर्की की अर्थव्यवस्था भी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और भारत में मोदी जी द्वारा आरंभ किये गए मेक इन इंडियाकार्यक्रम विदेशी निवेश के लिए अच्छे अवसर उपलब्ध कराता है. इस कार्यक्रम के तहत तुर्की भारत में निवेश कर सकता है. वर्तमान में, दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय व्यापार लगभग $ ६.४ बिलियन डालर है.

जहाँ तक कश्मीर मुद्दे का प्रश्न है, तो उत्तर शीत युद्ध के बाद से ही तुर्की ने उदासीन स्तिथि अपनायी हुई है. पहले तुर्की का झुकाव पाकिस्तान की तरफ बना हुआ था लेकिन अब तुर्की ने अपने आपको इस मुद्दे से अलग किया हुआ है. तुर्की का मानना है कि यह भारत और पाकिस्तान के मध्य   समस्या है और कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के ज़रिये समाधान करना चाहिए. एक बात और, भारत और तुर्की अफ़ग़ानिस्तान की आंतरिक परिस्तिथियों और पनपते हुए आतंकवाद को लेकर बहुत चिंतित है जहाँ पर दोनों देशों के राष्ट्रहित एक जगह मेल खाते है. अफ़ग़ानिस्तान में आंतरिक शान्ति एवं स्थिरता बनी रहे यह दोनों राष्ट्रों के साझा हित के लिए जरुरी है इसीलिए तुर्की ने दक्षिण एशिया में पनपते हुए आतंकवाद ओर तेज़ी से बढ़ रहे कट्टरवाद के विरूद्ध भारत को सहयोग देने के लिए कदम बढ़ाया है. इन सब से यह ज्ञात होता है कि तुर्की की दक्षिण एशिया नीति में जटिल बदलाव हुआ है. दूसरी ओर, भारत ने भी सायप्रस मुद्दे पर अपनी स्तिथि स्पष्ट कर दी है कि तुर्की और सायप्रस इस समस्या का शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के ज़रिये हल निकालें. जहाँ तक तुर्की की दक्षिण एशिया नीति में पाकिस्तान का प्रश्न है तो पाकिस्तान तुर्की की नीति में अब केंद्रीय स्थान नहीं रखता है.  सुरक्षा सम्बंधित चुनोतियों को लेकर भारत और तुर्की, चाहे क्षेत्रीय स्तर हो या अंतर्राष्ट्रीय स्तर, दोनों आतंकवाद के विरूद्ध एक दूसरें को सहयोग करते हैं. अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हुए नक्सली हमले में सी. आर. पी. एफ. लगभग २५ जवान शहीद हो गए, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगान ने इस हमले की कड़ी आलोचना की और साथ ही भारत के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए आतकवाद के विरूद्ध कार्यवाही में सहयोग करने का आश्वासन दिया.

वर्तमान में दोनों देशों के नेताओं द्वारा की गयी द्विपक्षीय यात्राओं से भारत और तुर्की के मध्य संबंधों में प्रगाढ़ता आयी है. तत्कालीन तुर्की के प्रधानमंत्री रेसेप तय्यिप एर्दोगान सन २००८ में तथा तुर्की के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह गुल सन २०१० में भारत यात्रा पर आये. भारत के राष्ट्रपति हामिद अंसारी अक्टूबर २०११ में तुर्की की यात्रा पर गए. सन २०१२-१३ में दोनों देशों के द्वारा कई मंत्री स्तरीय यात्रायें की गयी. सन २०१५ में, भारत की वर्तमान विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज तुर्की की यात्रा पर रही, और मार्च २०१५ में तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोग्लू ने नयी दिल्ली की यात्रा की. फरवरी २०१५ में, तुर्की के वित्त मंत्री मेहमेत सिम्सेक भारत की यात्रा पर आये और भारतीय वित्त मंत्री अरुण जेटली एवं पेट्रोलियम मंत्री धेमेंद्र प्रधान से वार्ता की. मार्च २०१५ में, तुर्की की राजधानी अंकारा में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए संयुक्त कार्य-दल की तीसरी बैठक हुई जिसमे भारत की ओर से विनोद कुमार, अपर सचिव एवं विदेशी मामलो के मंत्री, ने प्रतिनिधित्व किया. नवम्बर २०१५ में, पी. एम. नरेन्द्र मोदी समूह-२० की बैठक में भाग लेने के लिए तुर्की के अंताल्या शहर की यात्रा पर गए. अगस्त २०१६ में, तुर्की के विदेशी मामलो के मंत्री मेंलुत कवुसोग्लू आधिकारिक यात्रा के लिए भारत आये जोकि वैदेशिक मामलो को बढ़ावा देने की द्रष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण रही.

भारत और तुर्की के मध्य सम्बन्ध सांस्कृतिक क्षेत्रों में बहुत तेज़ी से प्रगाढ़ हो रहे हैं. सन २००० में, अंकारा विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय ने शिक्षा के क्षेत्र में अकादमिक सहयोग बढ़ाने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये. उसके उपरांत, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आई. सी. एच. आर) और तुर्की इतिहास कांग्रेस के मध्य अकादमिक विनिमय एवं सांस्कृतिक विनिमय को लेकर संयुक्त कार्यक्रमों पर सहमती हुई जोकि दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सहयोग को लेकर बहुत बड़ा कदम था. मार्च २०१५ में, तुर्की दूतावास, नयी दिल्ली, के सहयोग से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमे बहुत से तुर्की और भारतीय विद्वानों ने भाग लिया.

पी. एम. नरेन्द्र मोदी ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगान की कार्यकारी शक्तियों में वृद्दि होने पर, जिसके लिए १६ अप्रैल २०१७ को तुर्की में जनमत संग्रह कराया गया था, मुबारकबाद पेश की. इस जनमत संग्रह के द्वारा, तुर्की में प्रधानमंत्री का पद ख़त्म कर दिया जायेगा और राष्ट्रपति की शक्तियों का विस्तार किया जायेगा. ३० अप्रैल २०१७ को, तुर्की के राष्ट्रपति २ दिवसीय यात्रा के लिए नयी दिल्ली आ रहे है. हालांकि तुर्की परमाणु आपूर्ति समूह का एक सदस्य है और साथ ही भारत भी उसकी सदस्यता लेना चाहता है. ज्ञात हो कि परमाणु आपूर्ति समूह की अगली बैठक जून माह में होने जा रही है और भारत तुर्की से आशा करता है की तुर्की इस मुद्दे पर भारत को सहयोग दे लेकिन तुर्की परमाणु आपूर्ति समूह में पाकिस्तान को भी उसका सदस्य बनाने की हिमायत करता है. तुर्की के राष्ट्रपति की इस यात्रा के दौरान, आतंकवाद के विरूद्ध सहयोग को मज़बूत करना, द्विपक्षीय व्यापार और निवेश में वृद्दि करना, पर्यटन, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सहमती आदि पर वार्ता होने की सम्भावना है. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ लार्ड पामर्स्टन ने ठीक ही कहा है कि राजनीति में ना तो कोई स्थायी मित्र है, और ना स्थायी शत्रु, बल्कि हमारे हित स्थायी हैं, और ये प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है कि वो अपने हितों को पूरा करे.

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